भारतीय सीमा के अंदर घुस आए चीनी सैनिकों की वापसी बेशक सुखद है, पर किन शर्तों पर उन्होंने अपने तंबू उखाड़े हैं, इनका खुलासा होना भी जरूरी है। इससे इनकार नहीं कि उनकी वापसी में सैन्य मोर्चे पर हमारी सख्ती की कमोबेश भूमिका रही है, बल्कि बीजिंग को दिया गया कठोर संदेश ज्यादा प्रभावी हुआ होगा।
उसे दो टूक बता दिया गया कि ऐसे में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का चीन दौरा तो नहीं ही होगा, चीनी प्रधानमंत्री की बहुप्रचारित भारत यात्रा पर भी विराम लग सकता है। बीजिंग के लिए यह असहज करने वाली स्थिति इसलिए थी, क्योंकि उसके नए प्रधानमंत्री की यह पहली ही विदेश यात्रा होगी।
अगर यह सच है कि उनकी यात्रा के दौरान सीमा समस्या पर गंभीर वार्ता के लिए भारत पर दबाव बनाने के लिए ही इस घुसपैठ को अंजाम दिया गया, तब तो दौरा टलने पर बीजिंग की योजना ही चौपट हो जाती। इसलिए इस घटना का एक महत्वपू्र्ण सबक तो यह है ही कि सीमा समस्या पर दोतरफा बातचीत बहुत जरूरी है। पर अपनी पीठ थपथपाती सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि इस पूरे प्रसंग में उसकी खुद की भूमिका बेहद लचर रही है।
मसलन, शुरुआती प्रतिक्रिया में मनमोहन सिंह ने इसे स्थानीय मामला बताया था, जबकि उसके तुरंत बाद थलसेनाध्यक्ष की टिप्पणी चिंतित करने वाली थी! इसी तरह इस पूरे प्रसंग पर विदेश मंत्री की गोलमोल प्रतिक्रियाएं बीजिंग के मामले में हमारी दशकों पुरानी भीतकातर मानसिकता का ही प्रमाण थीं। इसीलिए यह सहज विश्वास नहीं होता कि चीनी सैनिक केवल जवाबी आक्रामकता से वापस लौट गए होंगे।
क्या यह सच नहीं है कि हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण उस चुमार चौकी पर मोर्चेबंदी बदलने की शर्त पर ही गतिरोध दूर हुआ है, जहां से चीनी सैनिकों की आवाजाही पर नजर रखी जा सकती थी? वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चीन अगर लगातार निर्माण कार्य कर रहा है, तो हमारी ओर से ऐसा निर्माण कार्य बीजिंग के लिए आपत्तिजनक क्यों होना चाहिए?
सवाल यह भी है कि यदि चीनी सैनिक हमारे इलाके में घुसे थे, तो उनके साथ-साथ हमारे सैनिकों ने वह क्षेत्र खाली क्यों किया। बीजिंग के साथ सामान्य संबंध बनाए रखना तो ठीक है, लेकिन इस पूरे मामले से जुड़ी सच्चाई जानने का देश को हक है।