सबका साथ-सबका विकास के वायदे के साथ केंद्र की सत्ता में आई मोदी सरकार के मंत्री और संघ परिवार हिंदुत्व के एजेंडे को बढ़ावा देने की जिन कोशिशों में लगे हैं, वे खतरनाक तो हैं ही, इससे उस सरकार के प्रति हताशा का भाव भी पैदा हो रहा है, जिससे साहसी फैसले लेने की उम्मीद की जा रही थी।
इसकी शुरुआत कथित 'लव जेहाद' के खिलाफ अभियान से हुई थी, पर उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में भाजपा को इसका लाभ नहीं मिला। फिर साध्वी निरंजन ज्योति की असंसदीय भाषा के बाद गीता, गोड्से, धर्मांतरण और राम मंदिर से जुड़ी टिप्पणियां न सिर्फ की जा रही हैं, बल्कि उस उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण की कोशिशें भी जारी हैं, जहां 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। पहले अलीगढ़ में सत्तर से अधिक लोगों की कथित 'घर वापसी' की गई। फिर पिछले दिनों आगरा में कुछ मुस्लिम परिवारों के धर्मांतरण की कोशिश की गई, पर विवाद बढ़ने पर उन लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया! अब भाजपा ने आगामी 25 दिसंबर को अलीगढ़ में ही धर्मांतरण के एक व्यापक आयोजन का ऐलान किया है, और इसके लिए बाकायदा चंदा भी मांगा जा रहा है!
जो पार्टी केंद्र की सत्ता में हो, कम से कम उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान ने हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी है। पर लोकसभा में बहस के दौरान भाजपा सांसद कथित 'घर-वापसी' अभियान के समर्थन में देखे गए। बेशक अतीत में धर्मांतरण हुए हैं, पर उसके पीछे हिंदू धर्म की कट्टर वर्ण व्यवस्था, छुआछूत और आर्थिक अभाव जैसे कारण जिम्मेदार थे। वेंकैया नायडू से लेकर अमित शाह तक धर्मांतरण-विरोधी कठोर कानून की बात कर रहे हैं, पर सवाल यह है कि देश के किस हिस्से में आज हिंदुओं का धर्मांतरण हो रहा है, जिस कारण इस कानून की जरूरत है।
यह पूरी कवायद संघ परिवार का एजेंडा भी हो सकती है, या संभव है, इसमें भाजपा की भी सहमति हो, पर इससे छवि तो सरकार की खराब हो रही है। लाजिमी यही है कि लाल किले से दस वर्ष तक सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री धर्मांतरण की इस कवायद पर सख्ती से पेश आएं।