मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) के प्रवेश और भर्ती घोटाले के दो और आरोपियों की मौतों को राज्य सरकार भले ही सामान्य बता रही हो, लेकिन इससे शिवराज सिंह चौहान सरकार की मुश्किलें बढ़ती ही दिख रही हैं। प्रदेश के व्यावसायिक कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा और पुलिस, वन रक्षक, नाप-तौल निरीक्षक से लेकर संविदा शिक्षकों की भर्ती परीक्षाएं आयोजित करने वाले व्यापमं के घोटाले की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी) तक ने जबलपुर उच्च न्यायालय के समक्ष स्वीकार किया है कि अब तक इस घोटाले से जुड़े 23 गवाहों या आरोपियों की अस्वाभाविक मौत हो चुकी है!
हालांकि कांग्रेस और इस घोटाले को उजागर करने वाले लोगों का कहना है कि मौतों की संख्या 40 से अधिक है। यह मामला कुछ-कुछ उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले की राह पर चलता दिख रहा है, जिसमें भी कई आरोपियों और गवाहों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। जाहिर है, अहम गवाहों और आरोपियों की मौत हो जाने से न केवल जांच प्रभावित हो सकती है, बल्कि यह भी संभव है कि उस बड़े नेटवर्क का खुलासा भी न हो पाए, जिसके जरिये इसे अंजाम दिया जा रहा था। मसलन, जिन दो आरोपियों की अभी मौत हुई है, उनमें से एक 29 वर्षीय असिस्टेंट प्रोफेसर नरेंद्र सिंह तोमर के पिता का आरोप है कि उनका बेटा कुछ बड़े नामों का खुलासा करने वाला था।
यह मामला हालांकि दो वर्ष पहले उजागर हुआ, लेकिन जांच से ये तथ्य सामने आए हैं कि पिछले सात-आठ वर्षों के दौरान कम से कम 1,000 लोगों की गलत तरीके से या तो नौकरियों में भर्ती हुई है या उन्हें मेडिकल या वेटनरी कॉलेजों में दाखिला दिलाया गया। यह घोटाला किस स्तर का है, इसका अंदाजा इससे भी लगता है कि इस मामले में प्रदेश के एक पूर्व शिक्षा मंत्री, पूर्व परीक्षा नियंत्रक सहित कई अधिकारियों और नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी है और राज्यपाल के एक आरोपी बेटे तक की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।
कुल मिलाकर इसने व्यापमं की साख को तो पूरी तरह खत्म कर ही दिया है, इसकी आंच से राज्य सरकार भी बच नहीं पाई है। बेशक, यह मामला बहुत बड़ा है जिसमें करीब पांच सौ आरोपी अब भी फरार हैं, लेकिन समयबद्ध तरीके से इसकी जांच पूरी न हुई, तो इसके तार और उलझते जाएंगे।