असम के कोकराझार और शोणितपुर जिलों के आदिवासी बहुल इलाकों में विगत मंगलवार को हुई हिंसा कमजोर लोगों को निशाना बनाने के कारण दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, इसलिए भी बहुत त्रासद है कि इसमें महिलाओं और बच्चों पर निर्ममता से हमला बोला गया। जिस नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एस) यानी संग्बिजित गुट पर इस हिंसा को अंजाम देने का आरोप है, वह खुद पिछले करीब छह महीने से सुरक्षा बलों के निशाने पर है।
बोडो उग्रवादी संगठनों में से कुछ के मुख्यधारा में लौटने या सरकार के साथ बातचीत की मेज पर बैठने के बावजूद इस समूह ने लड़ाई का रास्ता नहीं छोड़ा है, उल्टे पड़ोस के भूटान में उसके पनाह लेने के ब्योरे हैं। भूटान सीमा पर पिछले दिनों इसके दो उग्रवादियों के मारे जाने की प्रतिक्रिया में ही वे निर्दोष आदिवासी उनकी प्रतिहिंसा का ताजा शिकार बने हैं, जो असम के मूल निवासी नहीं हैं।
हालांकि पूरे इलाके में अर्धसैनिक बलों की तैनाती के साथ अब धारा 144 भी लगा दी गई है, इसके बावजूद इस मामले में राज्य की तरुण गोगोई सरकार की उदासीनता की अनदेखी नहीं की जा सकती। अगर यह सच है कि इस तरह की हिंसा की खुफिया जानकारी राज्य सरकार को पहले दे दी गई थी, तो सरकार समयोचित सक्रियता न दिखाने की जिम्मेदार तो है ही। मानो यह शुरुआती उदासीनता ही कम न हो, हिंसा की घटना के बाद भी राज्य के मुख्य सचिव काजीरंगा में परिवार के साथ छुट्टियां मना रहे थे, जिस पर खुद मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई! और अब, जैसी कि सूचना है, शिविरों में रह रहे प्रभावित परिवारों के लिए राहत की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यानी एक से अधिक मोर्चों पर राज्य सरकार की चूक साफ-साफ नजर आती है।
सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वालों और समाज के कमजोर समूहों को निशाना बनाने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने हिंसा की इस घटना को गंभीरता से लेते हुए सख्ती बरतने का जो इरादा जताया है, वह इस संदर्भ में बिल्कुल सही है। भूटान के साथ मिलकर इस उग्रवादी संगठन के खिलाफ कार्रवाई भी आवश्यक है। लेकिन ऐसे में इसका भी समुचित ध्यान रखना होगा कि उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रतिक्रिया की आंच वहां विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष के रूप में न सामने आए।