राजधानी के सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही 23 वर्षीय युवती के साथ जो कुछ हुआ, उससे किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। मगर उस युवती के लिए न्याय की गुहार लगा रहे हजारों युवाओं और आम लोगों की आवाज पहले तो सरकार ने अनसुनी ही कर दी और उसके बाद उसे बर्बरता के साथ दबाने की कोशिश की गई।
उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठियां बरसाई गईं और उन हर रास्तों को बंद कर दिया गया, जहां से सरकार तक पहुंचा जा सकता था। क्या लोकतंत्र में इस तरह के प्रदर्शन की गुंजाइश खत्म हो गई है? ऐसा लगता है कि सरकार या तो इसकी गंभीरता नहीं समझ पाई और इसे भी कोई राजनीतिक मसला मान रही है या फिर वह संवेदनहीन हो चुकी है।
ऐसा नहीं होता, तो प्रधानमंत्री को एक औपचारिक बयान देने में आठ दिन नहीं लगते। उनका बयान पीड़ित युवती और प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति तो जताता है, पर बलात्कार, यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने का आश्वासन नहीं देता।
गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो प्रदर्शनकारियों से मिलने से इंकार करते हुए परोक्ष रूप से उनकी तुलना माओवादियों से ही कर डाली! यह न केवल गैरजिम्मेदाराना है, बल्कि इससे गृह मंत्री के रूप में उनकी क्षमता पर सवाल भी उठते हैं। अब यह साबित हो गया है कि मौजूदा कानून, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था बलात्कार के मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने और ऐसे मामलों को रोकने में नाकाम हो चुके हैं।
दिल्ली की ही बात करें, तो यहां ऑटो और टैक्सी में मीटर तक चालू नहीं होते, जीपीआरएस सिस्टम की बात ही छोड़िए। ऐसे में जरूरी है कि ऐसे मामलों की तुरंत सुनवाई हो और ऐसा तंत्र विकसित किया जाए, जिससे अपराधियों के मन में खौफ पैदा हो।
देश के कई हिस्सों से अब त्वरित अदालतों के गठन के सुझाव आ रहे हैं, मगर पुलिस को नए तरीके से प्रशिक्षण दिए बिना यह पहल अधूरी रहेगी। और इस सबसे अलग हटकर सामाजिक जागरूकता की भी जरूरत है, क्योंकि कहीं न कहीं ऐसे मामलों के पीछे हमारा एकांगी विकास भी जिम्मेदार है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, शहरों से लेकर गांवों तक महिलाओं की सुरक्षा का यही हाल है। इसमें किसी तरह का वर्ग भेद नहीं है।