प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा की सफलता को केवल काठमांडू के साथ हुए समझौतों के जरिये नहीं, वहां के लोगों की प्रतिक्रियाओं के आईने में भी देखना चाहिए। पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री द्वारा नेपाल की संसद को संबोधित करना जितना उल्लेखनीय था, उससे कई गुना अधिक महत्वपूर्ण यह था कि उस संबोधन में नेपाल का दिल जीतने और उसे बराबरी का दर्जा देने की भावना थी।
उनके संबोधन में जहां कुछ नए जुमले थे, वहीं नेपाल की सांस्कृतिक प्रतीकों का उल्लेख भी था। पिछले काफी समय से नेपाल के प्रति हमारा व्यवहार बड़े भाई जैसा रहा है। उसके साथ रिश्तों की दिशा तय करते हुए कई बार हमारी सरकारें नौकरशाहों पर ज्यादा भरोसा करती आई हैं! नरेंद्र मोदी यह परंपरा तोड़ते दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने कुछ चीजें बहुत साफ-साफ कहीं-जैसे, नेपाल के अंदरूनी मामले में भारत दखल नहीं देगा, नई दिल्ली काठमांडू के विकास में विश्वास करता है और उसके साथ मिलकर काम करने का इच्छुक है। यही कारण है कि उनके संबोधन ने पार्टी लाइन से अलग हटकर वहां के राजनेताओं के साथ-साथ आम लोगों को भी बेहद प्रभावित किया है।
नेपाल को भारत एक अरब डॉलर का आसान कर्ज तो देगा ही, महाकाली नदी पर बहुद्देश्यीय पंचेश्वर पनबिजली परियोजना पर काम शुरू करने और दूरदर्शन व नेपाल टेलीविजन के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने जैसे समझौतों पर भी दोनों देशों की सहमति बनी है। उतना ही महत्वपूर्ण यह कि पनबिजली, पर्यटन और हर्बल औषधि जैसे कई क्षेत्रों में नेपाल की संभावनाओं का जिक्र करते हुए भारत ने उसकी मदद करने का भरोसा दिया है। नेपाल से निकलने वाली कोसी नदी से बिहार में बाढ़ का जो भीषण खतरा पैदा हो गया है, उस दिशा में भी दोनों देश सचेत और सक्रिय हैं।
सिर्फ दोतरफा रिश्तों में ऊर्जा पैदा करने के लिहाज से नहीं, नरेंद्र मोदी का यह दौरा कूटनीतिक तौर पर भी सफल रहा है। भूटान के बाद नेपाल को विदेश यात्रा के लिए चुनकर अपने पड़ोसी देशों का चीन से ध्यान हटाने की अपनी कोशिश में वह कमोबेश सफल होते दिखाई देते हैं। नेपाल में भारत के सबसे बड़े आलोचक माआवादी हैं, पर मोदी के भाषण पर प्रचंड की भावुक प्रतिक्रिया और फिर दोनों की मुलाकात से उम्मीदें पैदा हुई हैं। अब जरूरत इस बात की है कि दोतरफा आश्वासनों को व्यावहारिकता की जमीन पर उतारा जाए।