सहारनपुर में पिछले महीने हुए दंगों पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित जांच रिपोर्ट के जो ब्योरे सामने आए हैं, उससे लगता है कि सरकार अपनी जवाबदेही से बच निकलना चाहती है। जमीन के जिस विवाद ने दो समुदायों को आमने-सामने ला खड़ा किया था, उससे संबंधित मामले में अदालत का फैसला आ चुका है। जाहिर है, अदालत के इस फैसले की रक्षा करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की थी। यदि सूझबूझ से काम लिया जाता, तो ऐसी स्थिति आती ही नहीं।
राज्य के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव की अगुआई वाली पांच सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट ने दंगों के लिए स्थानीय भाजपा सांसद के साथ ही स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। मगर यह रिपोर्ट राजनीति से प्रेरित और राज्य सरकार की छवि को सुधारने की कवायद ही लगती है। रिपोर्ट में एक स्थानीय कांग्रेस नेता को भी जिम्मेदार ठहराया गया है, मगर लोकसभा चुनाव के दौरान अपने भड़काऊ भाषणों से चर्चा में आए एक अन्य नेता का रिपोर्ट में जिक्र तक नहीं है। स्वाभाविक रूप से भाजपा ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है।
वास्तव में राज्य की अखिलेश सरकार कानून-व्यवस्था, खासतौर से सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने के मामले में नाकाम साबित हुई है। मुजफ्फरनगर और सहारनपुर सहित राज्य के अन्य हिस्सों में हुए दंगे इसकी तस्दीक करते हैं। असल में इसके लिए राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की जरूरत है और इसमें सपा के साथ ही भाजपा, कांग्रेस और बसपा जैसे सभी दलों की अहम भूमिका होनी चाहिए।
दरअसल सियासी लड़ाई को सांप्रदायिक रंग न दिए जाने के लिए व्यापक सहमति की जरूरत है, मगर इसके लिए तैयार कौन है? यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में अभी जिन 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें सहारनपुर भी शामिल है। इन उपचुनावों के मद्देनजर एहतियात बरतने की भी जरूरत है। यह देखा ही जा चुका है कि सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने के लिए सिर्फ प्रशासनिक मशीनरी के भरोसे नहीं रहा जा सकता।
इसके लिए सरकार के साथ ही राजनीतिक दलों को भी सियासी स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाने का आह्वान किया है। क्या इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है?