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मुठभेड़ का सच

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इशरत जहां समेत चार लोगों की गुजरात में हुई मुठभेड़ की जांच में न सिर्फ करीब नौ साल लग गए, बल्कि सीबीआई द्वारा दाखिल इस आरोपपत्र से सभी सवालों के जवाब भी नहीं मिलते। इसके बावजूद डेढ़ हजार पृष्ठों का यह दस्तावेज अगर इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि वह मुठभेड़ फर्जी थी, तो एक लोकतंत्र के लिए यह बेहद चिंताजनक है।
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फर्जी एनकाउंटर का यह मतलब कतई नहीं है कि मारे गए वे चारों निर्दोष ही रहे होंगे; उनमें से तीन का अतीत आपराधिक रहा है, और कथित पाकिस्तानी बताए गए दो लोगों के शवों पर किसी ने दावा भी नहीं किया।

लिहाजा यह बिल्कुल हो सकता है कि वे लश्कर या किसी और आतंकी गुट से जुड़े रहे हों। इसके बावजूद जिस तरह उन्हें पकड़ा गया और उनकी हत्या कर दी गई, वे पर्याप्त संदेह पैदा करती थीं।
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पहले तो इसी पर शक है कि मुख्यमंत्री को निशाना बनाने के लिए आतंकवादी एक युवती के साथ आएंगे। अगर वे इस इरादे से आए भी थे, तो पकड़े जाने के बाद उन्हें अवैध तरीके से पुलिस हिरासत में क्यों रखा गया, इसका जवाब न तो गुजरात सरकार ने दिया, न राज्य पुलिस ने। किसी आतंकवादी की गिरफ्तारी के बाद उसे सजा कैसे दी जाती है, अजमल कसाब का मामला इसका उज्ज्वल दृष्टांत है।

इससे उलट इन कथित आतंकवादियों को न सिर्फ गुपचुप तरीके से मार डाला गया, बल्कि इस मामले की जांच कराने के गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को राज्य सरकार ने हरसंभव चुनौती भी दी! जिस राज्य के पूर्व गृह मंत्री एक फर्जी एनकाउंटर में नामजद हों और पूर्व डीजीपी निलंबित किए गए हों तथा एक दूसरे एनकाउंटर में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की गिरफ्तारी हुई हो और एक फरार चल रहा हो, वहां मुठभेड़ों को आतंकी खतरों का तर्क देकर जायज ठहराने की खतरनाक कोशिश हो रही है।

अलबत्ता इस पूरे मामले में केंद्र सरकार का रवैया भी राजनीति से ही प्रेरित है। उन चारों के बारे में गुजरात सरकार को चेतावनी आईबी ने दी थी, और तब केंद्र ने भी उन चारों को लश्कर से जुड़ा माना था। ऐसे में अब केंद्र का गुजरात सरकार पर हमलावर होने का औचित्य नहीं है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, उसे समझना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीति खतरनाक है।
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