जिस वस्तु एवं सेवा कर को कर सुधार के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है, उसके रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं, यह इस विधेयक पर लोकसभा में व्याप्त गतिरोध को देखकर पता चलता है। चूंकि इस प्रस्तावित कर व्यवस्था में केंद्र सरकार को रिटेल कीमतों पर कर वसूल करने और राज्यों को सेवा कर की वसूली का अधिकार देने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा, इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पारित कराने के अलावा इसे राज्य विधानसभाओं से भी पारित कराना पड़ेगा।
सरकार इसे आगामी एक अप्रैल से लागू करना चाहती है, इसलिए इसी सत्र में इसे पारित कराने की उसकी इच्छा है। पर ज्यादातर विपक्षी दलों का तेवर देखकर ऐसा लगता नहीं है कि इसकी राह इतनी आसान है। संयोग देखिए कि यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए प्रणब मुखर्जी ने जब जीएसटी को पेश किया था, तब इसके विरोधियों में भाजपा भी थी। पर आज कांग्रेस इसे पहले स्थायी समिति के पास भेजने की मांग कर रही है।
अलबत्ता इस मुद्दे को अर्थनीति के राजनीतिकरण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों का कहना है कि उन्हें इस विधेयक से जुड़े संशोधनों का अध्ययन करने के लिए समय चाहिए। कई राज्य सरकारों को, जिनमें भाजपा शासित हरियाणा भी है, यह आशंका खाए जा रही है कि जीएसटी लागू होने पर उन्हें आर्थिक नुकसान होगा। इसलिए हरियाणा सरकार घाटे की स्थिति में केंद्र से हर्जाने की गारंटी चाहती है।
एक समान कर व्यवस्था लागू होने के कई फायदे होंगे, यहां तक कि इससे आर्थिक विकास दर बढ़ने की भी बात कही जा रही है। लेकिन राज्यों की आशंका है कि इससे उनकी आय का स्रोत छिन जाएगा, इसलिए वे पेट्रोलियम और तंबाकू आदि को, कम से कम फौरी तौर पर, जीएसटी से बाहर रखने की मांग कर रहे हैं। उनकी शिकायत यह भी है कि जीएसटी की व्यवस्था चाहे कितनी भी पारदर्शी क्यों न हो, उसका ढांचा पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है। एक समान कर व्यवस्था आर्थिक सुधार के लिए आवश्यक है, जो विदेशी निवेशकों को भी आकर्षित करेगी, पर सबसे पहले जरूरी यह है कि जीएसटी पर देश में सर्वसहमति बनाई जाए।