रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए अंतिरम रेल बजट में करने को वैसे भी कुछ खास नहीं था, बची-खुची कसर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के तेलंगाना विरोधी चार मंत्रियों ने पूरी कर दी, जिसकी वजह से वह अपना भाषण तक पूरा नहीं कर सके। भारतीय संसदीय इतिहास में यह वाकया इसलिए भी दर्ज हो गया है, क्योंकि शोर-शराबा करने वालों में एक रेल राज्य मंत्री के जे सूर्यप्रकाश भी शामिल थे।
आसन्न आम चुनाव को देखते हुए वैसे भी यात्री किराये और माल भाड़े में वृद्धि की उम्मीद नहीं थी, मगर रेल मंत्री ने स्वतंत्र रेल किराया भाड़ा प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव रखा है, जिससे उम्मीद की जा सकती है कि किराये और भाड़े से संबंधित फैसलों में राजनीतिक दखलंदाजी कम होगी। मगर रेलवे आरक्षण को दलालों के कब्जे से मुक्त नहीं कराया जा सका है और अंतरिम बजट भी ऐसा कोई आश्वासन नहीं देता। इसके अलावा यात्री सुरक्षा और रेलवे में सुधार दो ऐसे मुद्दे हैं, जिनके बारे में तकरीबन हर रेल मंत्री आश्वासन तो देता है, मगर उस दिशा में ठोस प्रगति नहीं हो सकी है।
रेल मंत्री ने राजधानी सहित कुछ ट्रेनों में टक्कररोधी यंत्र लगाने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि हादसों की बड़ी वजह मानवरहित रेल फाटक हैं। जानकार कहते हैं कि रेल फाटकों के लिए सुरक्षाकर्मी या चौकीदार के पद सृजित कर नए रोजगार भी पैदा किए जा सकते हैं। बेशक, पिछले वर्ष विद्युतीकरण, दोहरीकरण और लाइनों के विस्तार के लक्ष्यों को हासिल किया गया है, लेकिन वास्तव में पिछले वर्षों में जिस तादाद में नई ट्रेनों की घोषणाएं हुई हैं, उसकी तुलना में रेल लाइनों का विस्तार नहीं हो सका है।
बेशक, अरुणाचल और मेघालय जैसे दूरस्थ राज्यों को रेल लाइन से जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है, मगर आज भी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां रेल लाइनें नहीं पहुंच सकी हैं। रेल मंत्री के लिए यह अच्छा मौका था कि चुनाव से पहले वह यूपीए के पिछले दस वर्ष के रेल बजटों की उपलब्धियों को सामने रख सकते थे, लेकिन यूपीए सरकार अपने ही अंतर्विरोधों में उलझती जा रही है, तिस पर विपक्ष उसे कोई मौका भी नहीं देना चाहता। वास्तव में संप्रग सरकार की हालत प्लेटफार्म पर खड़े उस मुसाफिर की तरह होती जा रही है, जिसकी ट्रेन छूट रही है!