प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन तीन योजनाओं को बृहस्पतिवार को हरी झंडी दी, वे शहरी विकास को गति देने के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं, इसमें शक नहीं। ये तीनों योजनाएं-सबके लिए घर, सौ स्मार्ट शहर और पांच सौ शहरों का कायाकल्प-पहले से कमोबेश चर्चा में रही हैं।
स्मार्ट सिटी भले ही अपेक्षाकृत नई अवधारणा हो, पर आबादी के बढ़ते बोझ को देखते हुए इसकी जरूरत बहुत पहले से महसूस की जाती रही है कि शहरों में बसावट न सिर्फ योजनाबद्ध तरीके से हो, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की जिस कमी से हमारे शहर जूझ रहे हैं, उसका भी स्थायी समाधान हो। यह देखना सुखद है कि शहरी विकास को रफ्तार देने की इस महत्वाकांक्षी योजना में उत्तर प्रदेश को प्रमुखता मिली है।
सिर्फ यही नहीं कि सर्वाधिक स्मार्ट शहर इसी राज्य में बनाए जाने हैं, बल्कि इसी सूबे के सबसे अधिक शहरों का कायाकल्प भी होना है। अगर इन योजनाओं में गांवों को महत्वहीन न कर दिया जाए, पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा बचाने की प्रतिबद्धता पर अमल हो, और रीयल एस्टेट बिल आगामी मानसून सत्र में पारित हो जाए, जैसी कि प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई है, तो शहरी भारत के बदलने की न सिर्फ सुखद शुरुआत हो सकती है, बल्कि यह टिकाऊ विकास की ओर हमारा मजबूत कदम भी हो सकता है। अलबत्ता यह ध्यान रखना होगा कि सबको घर मुहैया कराने की राजनीतिक घोषणाएं इससे पहले परवान नहीं चढ़ सकी हैं।
यही नहीं, गरीब तबकों को घर देने की विभिन्न आवासीय योजनाओं पर भ्रष्टाचार की छाया पड़ते भी हम देख चुके हैं। ऐसे में, 2022 तक सबको घर देने का लक्ष्य गहन प्रतिबद्धता की मांग करता है। इसी तरह स्मार्ट सिटी और शहरों का कायाकल्प कितना भी जरूरी क्यों न हो, उनकी राह में रोड़े भी उतने ही हैं। नए शहर बसाना एक बात है, पहले से तैयार शहरों का कायाकल्प करना दूसरी बात।
अनियोजित ढंग से बसे हुए हमारे ज्यादातर शहरों को कैसे संवारा जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। यदि उत्तर प्रदेश की ही बात करें, तो यहां बिजली-पानी और जनसंख्या के दबाव के अलावा भी कई समस्याएं हैं, जिनके समाधान में समय लगेगा। इस तरह की कठिनाइयां कमोबेश दूसरे राज्यों में भी हैं। फिर भी केंद्र सरकार की यह पहल सराहनीय है, क्योंकि इसमें शहरी भारत को बदलने की प्रतिबद्धता तो दिखाई पड़ती है।