उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और शामली में पिछले वर्ष सितंबर में हुए सांप्रदायिक दंगों के पीड़ितों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया जा रहा है, वह कम त्रासद नहीं है। सूबे की सपा सरकार ने दंगा पीड़ितों के लिए राहत और मुआवजे की घोषणा कर रखी है और वह चाहती है कि जिन्हें मुआवजा मिल गया है, उन्हें राहत शिविर छोड़ देना चाहिए।
हो सकता है कि शिविरों में ऐसे लोग हों, जिन्हें मुआवजा भी मिल गया है और वे शिविर से जाना नहीं चाहते। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जिन्होंने गलत तरीके से यह सरकारी मदद हासिल कर ली हो। मगर व्यापक रूप से देखें, तो पहला सवाल यही उठता है कि आखिर ऐसे हालात बने ही क्यों कि लोगों को अपने घरों और गांवों को छोड़कर ठिठुरती ठंड और बदहाली में शिविरों में रहना पड़ रहा है। जो लोग शिविरों में हैं, वे अपने गांवों से उखड़ गए हैं और उनके रोजगार का जरिया छिन गया है।
आखिर राज्य सरकार ने दंगा पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास को लेकर कोई ठोस योजना क्यों नहीं तैयार की, ताकि ये लोग सम्मानजनक तरीके से जी सकें। हकीकत यह है कि शिविरों में अनेक बच्चों की ठंड या दूसरे कारणों से मौत हो चुकी है और अब भी सैकड़ों लोग बदहाली में हैं। अब भी देर नहीं हुई है, पुनर्वास के लिए सभी राजनीतिक दलों और संबंधित समुदाय के प्रबुद्ध लोगों को विश्वास में लेकर पहल की जा सकती है। इसके उलट राज्य सरकार मुस्लिम समुदाय के आरोपियों पर से मुकदमे वापस लेना चाहती है, जिससे पूरे समुदाय का भला नहीं होने वाला।
लोग भी अब तुष्टीकरण की सियासत से तंग आ चुके हैं। दंगा प्रभावित अधिकांश लोग छोटे किसान या छोटे-मोटे रोजगार से जुड़े हुए थे, जिन्हें सम्मानजनक जीवन चाहिए। मगर लगता है कि यह सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। हालत यह है कि मुजफ्फरनगर के प्रभारी मंत्री आजम खान के नेतृत्व में सूबे के आठ मंत्रियों और अनेक विधायकों का दल अध्ययन अवकाश पर यूरोप रवाना हो चुका है।
क्या बुनियादी जवाबदेही को समझने के लिए वाकई किसी अध्ययन की जरूरत है! और विडंबना यह है कि सूबे में जब एक तबका बुनियादी चीजों के लिए मशक्कत कर रहा है, सैफई महोत्सव के जरिये वैभव का प्रदर्शन किया जा रहा है।