सोलहवीं लोकसभा के लिए हुआ पांचवें चरण का मतदान केवल सर्वाधिक 121 सीटों पर हुई वोटिंग के कारण तो उल्लेखनीय है ही, इसका महत्व इसलिए भी है कि इस चरण में भाजपा और कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय दलों का भी बहुत कुछ दांव पर लगा है।
अगर चेहरों की बात करें, तो सुशील कुमार शिंदे, वीरप्पा मोइली, सीपी जोशी, नंदन नीलेकणि, सचिन पायलट से लेकर गोपीनाथ मुंडे, मेनका गांधी, शत्रुघ्न सिन्हा, जसवंत सिंह जैसे दिग्गजों और अभिषेक सिंह, जयंत सिन्हा, मीसा भारती व बाइचुंग भूटिया जैसे नवोदितों का फैसला मतदाताओं ने कर दिया है। अच्छी बात यह है कि पांचवें चरण में भी मतदान का प्रतिशत बढ़ा हुआ, लगभग साठ फीसदी, रहा और चुनावी हिंसा की घटनाएं कम हुईं।
इस चरण में बेहतर प्रदर्शन का दबाव भाजपा पर सबसे अधिक है, तो केवल इसलिए नहीं कि पिछली बार यहां उसने सर्वाधिक सीटें जीती थीं, बल्कि जिस कर्नाटक में सभी सीटों पर वोटिंग हुई है, वहां उसके सामने अपने पिछले लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को बेहतर करने की चुनौती भी है। कथित मोदी लहर के अलावा येदियुरप्पा के पार्टी में लौटने को वह अपने पक्ष में बता तो रही है, पर विधानसभा चुनाव हारने के एक साल के भीतर दमदार वापसी तब भी बहुत आसान नहीं है, जहां कांग्रेस अपना गढ़ बचाने के लिए पूरी कोशिश करेगी।
देखना यह भी है कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद पांचवें चरण में राजस्थान की 20 सीटों में से कितने पर भाजपा का कब्जा होता है। उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड की 11 सीटों पर भी दमदार प्रदर्शन करना होगा। इसी तरह कांग्रेस के सामने महाराष्ट्र, राजस्थान और ओडिशा के साथ-साथ उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश-रूहेलखंड में भी अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव है, जहां अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियों के वोटरों की बड़ी तादाद है।
उत्तर प्रदेश की इन सीटों पर सपा और बसपा का भी व्यापक जनाधार है। कांग्रेस का प्रदर्शन मध्य प्रदेश की करीब एक तिहाई सीटों पर भी देखने लायक होगा। कर्नाटक में जद(एस), महाराष्ट्र में शिव सेना-एनसीपी और ओडिशा में बीजद के लिए चुनाव का यह चरण महत्वपूर्ण है, तो बिहार में जद(यू) के लिए चुनौतीपूर्ण। साफ है कि लोकसभा चुनाव का नतीजा इन सीटों के परिणामों पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।