थाईलैंड की अपदस्थ प्रधानमंत्री यिंगलक शिनवात्रा की कहानी एशिया और विश्व की उन पूर्व महिला शासनाध्यक्षों से बहुत अलग नहीं है, जिनसे उम्मीदें तो बहुत थीं, पर जिन्होंने निराश ही अधिक किया। वर्ष 2011 के चुनाव में भारी मतों से जीतकर सत्ता हासिल करने वाली यिंगलक थाईलैंड की पहली महिला प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ सबसे कम उम्र की शासनाध्यक्ष भी थीं। अगर प्रभावशाली राजनीतिक परिवार की विरासत संभालने का दबाव न होता, तो यह सफल कारोबारी शायद ही राजनीति में आतीं। पर करीब ढाई साल में ही उनके राजनीतिक जीवन पर संशय के बादल घिर गए हैं।
अपने ताकतवर परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए पहले सांविधानिक अदालत ने उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया, और अब भ्रष्टाचार-निरोधक आयोग ने उनके खिलाफ महाभियोग चलाने का फैसला दिया है, जिससे उन पर पांच साल का प्रतिबंध लग सकता है। हालांकि आयोग ने जिस चावल सब्सिडी योजना में उन्हें दोषी ठहराया है, वह निजी भ्रष्टाचार के बजाय नौसिखिएपन का सुबूत ही ज्यादा लगता है। उस योजना के तहत किसानों को उनके चावल की कीमत बाजार दर से दोगुनी दी गई, जिससे पहले से बदहाल अर्थव्यवस्था लगभग ध्वस्त हो गई।
दरअसल सैन्य वर्चस्व वाले मुल्क में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को जो खतरा होता है, वह यिंगलक के साथ भी था। भूलना नहीं चाहिए कि बाढ़ के समय उन्होंने आपातकाल लागू करने का सेना का आग्रह ठुकराया था। लेकिन सत्ता में आते ही राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के महासचिव के स्थानांतरण और पिछले नवंबर में निचले सदन में एक क्षमादान विधेयक पारित करने जैसे फैसले, जिसके जरिये उनके स्व निर्वासित भगोड़े भाई और पूर्व प्रधानमंत्री थाक्सिन शिनवात्रा की सजा भुगते बगैर वतन वापसी संभव हो जाती, इस आरोप की पुष्टि ही करते थे कि राजनीतिक विरासत की रक्षा करने से भी ज्यादा वह अपने बड़े भाई का एजेंडा लागू कर रही हैं।
यिंगलक का भविष्य चाहे जो भी हो, पर यह समूचा घटनाक्रम उस थाईलैंड के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, जो निरंतर विरोध प्रदर्शनों के कारण आर्थिक रूप से जर्जर होता जा रहा है, और अब जहां जुलाई में नए सिरे से चुनाव की संभावना भी धूमिल होती दिख रही है।