सिविल सेवा परीक्षा में सी-सैट के मुद्दे पर सरकार जो समाधान लेकर आई है, उससे हिंदीभाषी परीक्षार्थियों की मांगें पूरी होनी तो दूर, उल्टे अब दक्षिण भारत में भी विरोध के स्वर गूंजने लगे हैं। दरअसल सी-सैट को खत्म करने की मांग करने वाले परीक्षार्थी हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के बराबर महत्व देने के आग्रही हैं और उनकी यह भी अपेक्षा है कि मानविकी के छात्रों को इसमें पहले जैसा महत्व मिले। उनकी एक प्रमुख मांग कांप्रिहेंशन के सवालों के गूगल अनुवाद से मुक्ति की भी है, जो अर्थ का अनर्थ कर देता है। अरविंद वर्मा कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में अनुवाद का स्तर सुधारने की सिफारिश की।
पर यह हैरान करने वाला है कि इन सबकी अनदेखी कर सरकार सी-सैट में अंग्रेजी के अंकों को मेरिट में न जोड़ने का समाधान लेकर आई है! इसके अलावा 2011 के परीक्षार्थियों को एक साल और परीक्षा देने का मौका दिया जाएगा, जो झुनझुने से अधिक नहीं। यह समझने की जरूरत है कि हिंदी पट्टी के आंदोलनकारी परीक्षार्थी भी अंग्रेजी के सीधे विरोध में नहीं हैं।
अव्वल तो सी-सैट में अंग्रेजी के जो प्रश्न पूछे जाते हैं, वह दसवीं-बारहवीं के स्तर के ही हैं, तिस पर सिविल सेवा जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में अंग्रेजी हटाने की सोच बहुत व्यावहारिक नहीं है। पर सरकार ने छात्रों के इस आंदोलन को हिंदी बनाम अंग्रेजी का विवाद समझ लिया। अगर सचमुच ऐसा होता, तब भी एक गंभीर मुद्दे पर ऐसे समाधान की उम्मीद कतई नहीं थी। विडंबना यह भी है कि ऐसे एक संवेदनशील मसले पर सरकार द्वारा लिए गए फैसले को अब वोट बैंक से प्रेरित बताया जा रहा है।
सी-सैट में अंग्रेजी को महत्वहीन करते हुए यह भी नहीं सोचा गया कि यह निर्णय अहिंदी भाषी परीक्षार्थियों के लिए कितना नुकसानदेह साबित हो सकता है। मानो दक्षिण में इसके खिलाफ पैदा आक्रोश ही कम न हो, हिंदी को महत्व देने से सिविल सेवा के प्रश्नपत्र में अब दूसरी भाषाओं को भी प्रतिनिधित्व देने की मांग उठने लगी है। क्या सरकार को इसका अंदेशा नहीं था?
सिर्फ यही नहीं कि सरकार इस विवाद का ठीक ढंग से निपटारा नहीं कर पाई, बल्कि उसने फैसला लेने में भी देरी कर दी है। प्रारंभिक परीक्षा के महज बीस दिन पहले 'समाधान' आने से खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि के उन परीक्षार्थियों का भी भला नहीं होने वाला, जिन्हें इसका कुछ वास्तविक लाभ मिल सकता था।