मानसून सत्र के शुरुआती दो दिन संसद में जो दृश्य दिखाई पड़े हैं, वे अप्रत्याशित नहीं हैं, पर अगर यही हाल रहा, तो इस सत्र की नियति के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। लोकसभा चुनाव में बदतरीन पराजय के बाद कांग्रेस संसद में पहली बार इतनी आक्रामक दिख रही है, तो दुर्योग से यह अवसर उसे भाजपा ने ही मुहैया कराया है। यह भी स्पष्ट है कि कांग्रेस को इन मुद्दों के जरिये अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का जो अवसर हाथ लगा है, उसे वह यों ही बेकार नहीं होने देना चाहेगी।
वर्ना सुषमा स्वराज के मुद्दे पर सत्ता पक्ष द्वारा बहस के लिए तैयार होने के बावजूद वह विदेश मंत्री का इस्तीफा मांगने की जिद पर अड़ी नहीं रहती। वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफों की मांग करते हुए कांग्रेस ने यह तक नहीं सोचा कि फिर राजस्थान, गोवा और उत्तराखंड में कांग्रेस राज में हुए घोटाले भी सामने आ सकते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के निजी सचिव से जुड़े घोटाले का एक स्टिंग सार्वजनिक कर भाजपा ने पलटवार किया ही है। पर ऐसे तो गतिरोध नहीं टूटेगा। यह बिल्कुल हो सकता है कि कांग्रेस इस पूरे सत्र में कामकाज न करने देने की योजना पर चल रही हो, क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। बल्कि संसद इसी तरह बाधित होती रही, तो रणनीतिक रूप से वह लाभ भी उठाना चाहेगी, क्योंकि विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी विधेयक पारित न होने की स्थिति में जनता के सामने राजग सरकार की छवि खराब होगी।
लिहाजा सत्ता में होने के कारण भाजपा पर यह गुरुतर जिम्मेदारी है कि वह इस गतिरोध का हल ढूंढे। मानना मुश्किल है कि सत्ता पक्ष की जवाबी आक्रामकता इस गतिरोध का हल हो सकती है। इसके बजाय उन विपक्षी दलों के साथ तालमेल बनाकर चलना कहीं बेहतर होता, जो संसद में भाजपा का विरोध करने के बावजूद कांग्रेस के पीछे चलने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन अब तक सत्ता पक्ष की ओर से इस रणनीति का परिचय नहीं मिला है। जिस सरकार के सामने भूमि अधिग्रहण के अलावा भी जीएसटी, रीयल एस्टेट विधेयक, स्मॉल फैक्टरीज बिल और श्रम सुधार से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की बड़ी चुनौती हो, उसे ऐसी पहल करने पर अपना ध्यान केंद्रित करना ही होगा, जिससे संसद का कामकाज चले।