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उन्हें उनका हक

Tue, 15 Apr 2014 07:54 PM IST
नई दिल्ली
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पुरुष और स्त्री से भिन्न शारीरिक पहचान रखने वाले समूह को सामाजिक मान्यता दिलाने का सर्वोच्च न्यायालय का बहुप्रतीक्षित निर्णय प्रशंसनीय है। शीर्ष अदालत ने उस समूह के पक्ष में यह फैसला दिया है, जिसे संबोधित करने का तरीका ही अपने आप में अमर्यादित और शेष समाज की उनके प्रति सोच का सुबूत है।
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चुनाव आयोग द्वारा इनका संज्ञान लेने और पिछली जनगणना में इनके लिए अलग कॉलम का प्रावधान करने के बाद उम्मीद बंधी थी कि संविधान ने सबको समानता का जो अधिकार दिया है, वह इन्हें भी मिलेगा। राष्ट्रीय विधिक प्राधिकरण ने शीर्ष अदालत में याचिका डालकर इस दिशा में पहल की थी, तो लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जैसों ने भी याचिकाओं के जरिये अपने हक की इस लड़ाई में सार्थक हिस्सेदारी की। इसी का नतीजा है कि उन्हें अपनी अलग पहचान मिली है।

हालांकि नेपाल की शीर्ष अदालत ने 2007 में ही इन्हें अलग पहचान का दर्जा देने का फैसला दे दिया था, जिस पर अमल में हालांकि देर हुई। इसी तरह बांग्लादेश में 2008 के चुनाव में इस समुदाय को अन्य के तहत वोट डालने का अधिकार मिल चुका था। अपने देश में हालांकि तमिलनाडु जैसे राज्यों में इनके कल्याण के लिए पहचान पत्र की व्यवस्था, उच्च शिक्षा हासिल करने का हक तथा पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की गई थी। कुछेक को रोजगार भी दिया गया। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इनके प्रति सदियों-शताब्दियों पुरानी उपेक्षा का ही माहौल रहा है।
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कुछ वर्ष पहले चुनावों में इनकी इक्का-दुक्का भागीदारी से तस्वीर बदलने की जो उम्मीद थी, वह भी सामाजिक-राजनीतिक उपेक्षा से टूट चुकी थी। देश भर में इनकी आबादी बीस से तीस लाख के बीच बताई जाती है, लेकिन इनके प्रति इतनी उपेक्षा है कि इन्हें किसी मर्यादित पेशे के लायक नहीं समझा जाता। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला एक उम्मीद के रूप में आया है।

शीर्ष अदालत ने इस वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग में रखते हुए इन्हें शिक्षा और रोजगार में आरक्षण देने की जो जरूरत बताई है, उसका दूरगामी महत्व है। अदालत ने तो इस वर्ग के मानवाधिकार को बहाल करने की दिशा में पहल कर दी है, अब सरकारों और समाज की जिम्मेदारी है कि वे इनके प्रति अपना सदियों पुराना नजरिया बदलें।
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