आंध्र प्रदेश के विभाजन के सोलह महीने के भीतर ही अमरावती में नई राजधानी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधारशिला रखने के सिर्फ सांकेतिक महत्व नहीं हैं। तेलंगाना राज्य के गठन के विरोध के पीछे सबसे बड़ी वजह अविभाजित राज्य की राजधानी हैदराबाद भी थी। दरअसल तेलंगाना के हिस्से में देश के समृद्ध महानगरों में शुमार हैदराबाद के चले जाने के बाद बड़ा सवाल यह था कि आखिर आंध्र में राजधानी का क्या होगा।
मगर दूरदर्शी मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु ने विजयवाड़ा और गुंटुर के बीच स्थित उस छोटे से कस्बे अमरावती के आसपास के क्षेत्र को चुना, जो 1800 वर्ष पहले सातवाहन राजाओं की राजधानी हुआ करता था। कृष्णा नदी के मुहाने पर स्थित अमरावती तक राज्य के सभी हिस्सों की पहुंच आसान है। स्वतंत्र भारत में चंडीगढ़ को शहर नियोजन के लिहाज से आदर्श राजधानी के तौर पर देखा जाता है, जिसे गांवों की जमीनें अधिगृहीत कर बसाया गया था।
मगर, चंद्रबाबू नायडु ने अमरावती को जिस तरह सिंगापुर की तर्ज पर बसाने की योजना बनाई है, उससे निश्चिय ही शहर नियोजन को लेकर एक नई दृष्टि सामने आएगी। अमरावती का मास्टर प्लान-2050 सिंगापुर ने ही तैयार किया है, जिसमें इस क्षेत्र को त्रिस्तरीय तरीके से विकसित करने की योजना है। यही नहीं, नायडु ने इस क्षेत्र में करीब 23 हजार एकड़ जमीन किसानों से अधिगृहीत कर जमीन अधिग्रहण का ऐसा मॉडल भी प्रस्तुत किया है, जिसमें किसानों को अगले दस वर्षों तक प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा तो मिलेगा ही, उन्हें राजधानी में आवासीय और वाणिज्यिक उपयोग के लिए जमीन भी मुहैया कराई जाएगी।
मगर, इस नई राजधानी में सब कुछ उजला नहीं। यह इलाका खेती के लिए जाना जाता है, लिहाजा यहां अब कंकरीट के जंगल बस जाने का अंदेशा भी है। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने ठीक ही कहा है कि प्रतिकूलताओं को समस्या न मानकर अवसर में बदलने की जरूरत है। हैदराबाद को साइबराबाद बनाने वाले चंद्रबाबू को ध्यान रखना होगा कि अमरावती ऐसे केंद्र के रूप में विकसित न हो, जो सिर्फ निवेशकों और उद्योगपतियों तक ही सीमित हो, बल्कि यह अपने ऐतिहासिक गौरव के अनुरूप लोकतांत्रिक सत्ता का केंद्र भी बने।