पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम को सर्वोच्च न्यायालय का जज बनाए जाने पर केंद्र सरकार की आपत्ति से अप्रिय स्थिति पैदा हो गई है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। बची-खुची कसर सार्वजनिक हो चुकी सुब्रमण्यम की प्रधान न्यायाधीश को लिखी चिट्ठी से पूरी हो गई है, जिसमें उन्होंने अपनी दावेदारी वापस लेने का ऐलान करते हुए सरकार की नीयत पर सवाल उठाए हैं।
मोदी सरकार ने सीबीआई और आईबी की जिन रिपोर्ट्स के हवाले से सुब्रमण्यम के नाम पर ऐतराज किया है, दरअसल उससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। पहला सवाल तो इन दोनों शीर्ष खुफिया एजेंसियों के राजनीतिकरण को लेकर ही उठता है। खुद सर्वोच्च अदालत सीबीआई को पिंजरे का तोता बता चुकी है, और यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान भाजपा भी सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगाती रही।
हैरानी की बात यह है कि जो सीबीआई बीते दो दशकों के दौरान मुंबई बम कांड से लेकर संसद में हुए हमले और हाल में इटली के नौसैनिकों से जुड़े मामलों तक में गोपाल सुब्रमण्यम की सेवाएं लेती रही, उसी ने नई सरकार के आने के बाद अब 2 जी स्पेक्ट्रम के मामले को लेकर उनकी निष्ठा और ईमानदारी पर सवाल उठाए हैं! यही नहीं, एनडीए की पिछली सरकार के समय तक आईबी ने कई मामलों में सुब्रमण्यम की सलाह ली, लेकिन सरकार को भेजी रिपोर्ट में कथित तौर पर उसने भी उनके व्यवहार को लेकर नकारात्मक टिप्पणी की है।
आखिर गोपाल सुब्रमण्यम की ईमानदारी और निष्ठा पर अचानक शक क्यों किया जा रहा है? यह नहीं भूलना चाहिए कि खुद सर्वोच्च अदालत गोपाल सुब्रमण्यम को कई मामलों में न्याय मित्र के रूप में नियुक्त कर चुका है, जिनमें चर्चित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामला भी है, जिसमें गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार पर उंगली उठी थी। यदि उनके नाम पर ऐतराज की यह एक वजह है, तब तो यह और भी चिंताजनक बात है।
यह दुखद है कि इस प्रकरण ने न्यायपालिका को बेवजह राजनीति में घसीट लिया है। दूसरी ओर सुब्रमण्यम ने जिस तरह से इस मुद्दे को लेकर न्यायपालिका तक को कठघरे में खड़ा किया है, उससे भी कोई अच्छा संदेश नहीं गया है। नए इरादों के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार को चाहिए कि वह न्यायपालिका की स्वायत्तता को बनाए रखे, तभी उसकी साख भी बनी रहेगी।