नेपाल की राजनीतिक पार्टियां बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, यह संविधान निर्माण के लिए बनी दूसरी संविधान सभा का भी पहली सभा जैसा हश्र होने से पता चलता है। आज इसकी अंतिम तारीख है, पर विरोधी गठबंधन द्वारा बुलाई गई हड़ताल को देखते हुए लगता नहीं है कि आखिरी वक्त में उनमें सर्वसम्मति देखने को मिलेगी।
नेपाल के सत्ताधारी सीपीएन-यूएमएल गठबंधन की विफलता यह है कि पर्याप्त समय मिलने के बावजूद वह संविधान निर्माण के लिए राजनीतिक सहमति का माहौल नहीं बना सका। चूंकि संविधान निर्माण पर नेपाल में लंबे समय से राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है, ऐसे में सुशील कोइराला सरकार को ज्यादा सक्रिय और लचीला होना चाहिए था, पर उन्होंने इसका परिचय नहीं दिया। विपक्षी गठबंधन की भूमिका तो और भी निंदनीय है।
विवादित मुद्दों को हल करने के लिए प्रश्नोत्तर समिति के गठन की संविधान सभा के अध्यक्ष की पहल पर प्रचंड और उनके सहयोगी इतने आगबबूला हो गए कि उन्होंने सदन की मर्यादा तक का ध्यान नहीं रखा। सिर्फ यही नहीं कि उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के सांसदों पर हमला बोला, बल्कि अध्यक्ष भी उनके निशाने पर थे! वे यहीं नहीं रुके। जो देश बिजली-पानी के भीषण अभाव और मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की समस्या से जूझ रहा है, उस देश को विरोधी गठबंधन ने हड़ताल के मोर्चे पर झोंक दिया।
प्रचंड अगर समझते हैं कि उनके इस आंदोलनकारी तेवर से नेपाली जनता खुश होगी, तो उन्हें उस ताजा सर्वेक्षण पर नजर दौड़ानी चाहिए, जिसमें लोकप्रियता के पैमाने पर वह बहुत नीचे हैं। नेपाल की तस्वीर संवारने का जो मौका उन्हें मिला था, उसे उन्होंने पहले ही गंवा दिया। अगर यह सच है कि संविधान निर्माण के गतिरोध की एक बड़ी वजह वह सवर्ण सोच है, जो मधेशियों और दूसरे भूमिपुत्रों को उनका जायज हक देने से रोक रही है, और उसमें खुद प्रचंड की भी भूमिका है, तो फिर उनकी कथित सामाजिक क्रांति की असलियत समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए।
संविधान बनाने के लिए, हो सकता है, दूसरी संविधान सभा को कुछ समय की मोहलत मिल जाए, पर बेहतर यही होगा कि नेपाल की तमाम राजनीतिक पार्टियां देश के भविष्य के बारे में सोचते हुए इस पर सहमति बनाएं। पिछले छह वर्षों से गतिरोध कायम रखकर वे पहले ही अपनी छवि खराब कर चुकी हैं।