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कानूनों का बोझ

Tue, 30 Sep 2014 08:19 PM IST
नई दिल्ली
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका प्रवास के दौरान निवेशकों को लुभाने के लिए पुराने कानूनों को बदलने की बात की है। इससे पहले भी एनडीए सरकार असंगत और अव्यावहारिक हो चुके कानूनों को रद्द करने की प्रतिबद्धता जता चुकी है और अभी विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी संकेत दिए हैं कि इस सिलसिले में संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार विधेयक ला सकती है।
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दरअसल स्वतंत्रता मिलने और संविधान लागू होने के छह दशक बाद भी देश अंग्रेजों के समय के बने सैकड़ों कानूनों को ढो रहा है। अंग्रेजों ने भारत में शासन की अपनी व्यवस्था कायम की थी और अपने हितों को ध्यान में रखकर कानून बनाए थे। उस वक्त कानूनों में शासक और शासित वर्ग के बीच साफ फर्क रखा गया था। ऐसा नहीं है कि अप्रचलित और बेकार हो चुके कानूनों को रद्द करने की बात पहले नहीं उठी। इससे पहले विधि आयोग अपनी कई रिपोर्ट्स में ऐसे कानूनों को रद्द करने की सिफारिश कर चुका है।

इसके अलावा प्रशासनिक कानूनों की समीक्षा के लिए बनाए गए पी सी जैन आयोग ने भी अप्रासंगिक या बेकार हो चुके 1,300 से अधिक कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की थी, जिनमें से दो सौ से अधिक कानूनों को रद्द भी किया जा चुका है। मगर अब भी कई ऐसे कानून हैं, जिन्हें ढोने का मतलब नहीं है। इनमें सात सौ से अधिक तो लेखानुदान से संबंधित हैं, जो तात्कालिक जरूरतों के लिहाज से बनाए गए थे। इसके अलावा देश के विभाजन के तुरंत बाद कुछ ऐसे भी कानून बनाए गए थे, जो विभाजन के समय उपजी समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, जो अब बेकार हो चुके हैं।
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बात सिर्फ अव्यावहारिक या असंगत हो चुके कानूनों की नहीं है, अनेक ऐसे कानून है, जिन्हें देखकर लगता है कि अब भी देश में अंग्रेजों के समय की व्यवस्था चली आ रही है। 1927 के वन अधिकार और 1894 के जमीन अधिग्रहण कानून को इस श्रेणी में रखा जा सकता है, जिन्हें बदलने में अस्सी से सौ बरस तक लग गए। अब इन दोनों कानूनों को भी बदलने की बात होने लगी है, क्योंकि इन्हें निवेश और विकास की राह में रोड़ा माना जा रहा है! बेशक, सुशासन के लिए अव्यावहारिक कानूनों को बदलने की जरूरत है, मगर न्यायसंगत व्यवस्था एकतरफा सोच के साथ नहीं कायम की जा सकती, इसमें संतुलन की जरूरत है।
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