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सरहद पर आतंकी हमला

Mon, 03 Nov 2014 08:50 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान की सीमा में किया गया आत्मघाती हमला बताता है कि दोनों देशों की सरहद भी आतंकियों की जद में आ चुकी है। जिस जगह हमलावर ने धमाका किया, वह अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज 350 मीटर दूर थी! जाहिर है, यह आतंकी हमला सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी चिंता का कारण है, क्योंकि वाघा बॉर्डर पर हर शाम ध्वज उतारने के समय होने वाले रिट्रीट कार्यक्रम को देखने के लिए दोनों ओर से हजारों लोग आते हैं। रविवार शाम को भी यही स्थिति थी, जब धमाके में पचास से अधिक लोगों की मौत हो गई।
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हैरत की बात है कि ऐसे हमले की आशंका पहले से थी, इसके बावजूद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां और सुरक्षा बल इसे रोकने में नाकाम रहे। यह हमला सिर्फ पाकिस्तान का अंदरूनी मामला नहीं है, इससे भारत के हित भी जुड़े हुए हैं, क्योंकि सड़क मार्ग होने के कारण दोनों देशों के लोगों की आवाजाही का यह सबसे सस्ता और सुगम मार्ग है। यह तो जांच में पता चलेगा कि इसके पीछे किस संगठन का हाथ था और उसका मकसद क्या था, पर इसे आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की नाकाम नीति के रूप में भी देखा जा सकता है।

हकीकत यह है कि पाकिस्तान निरंतर आतंकवाद से जूझ रहा है और इसी के चलते वहां के सुरक्षा बलों ने उत्तरी वजीरिस्तान में आतंकी गुटों के खिलाफ ऑपरेशन जर्ब ए अज्ब चला रखा है। मगर दूसरी ओर, सरकारी स्तर पर पाकिस्तानी तालिबान से लुक-छिपकर बातचीत करने के संकेत भी मिलते रहे हैं। यदि यह हमला, जैसी कि आशंका जताई जा रही है, पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए किया गया था, तब तो यह वहां के पूरे सुरक्षा तंत्र के लिए भी चिंता की बात होनी चाहिए। मगर आतंकवाद पर पाकिस्तान दोहरा रुख अपनाता आया है, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण ओसामा बिन लादेन की मौत के रूप में सामने आया था।
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यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान की अफगानिस्तान से लगी सीमाएं आतंकियों की सबसे बड़ी पनाहगाह हैं, जिसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ा है। पाकिस्तान के विभिन्न सत्ता केंद्रों को यह समझने की जरूरत है कि निरंतर मिल रही आतंकी धमकियां देश की शांति, स्थिरता और विकास की राह में सबसे बड़ी बाधक हैं, जिनसे निपटने के लिए उन्हें आतंकवाद पर दोहरा रुख छोड़ना होगा।
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