करीब पांच वर्ष पहले देश में स्वाइन फ्लू से पहली मौत दर्ज की गई थी, लेकिन इसने आज देश के कई हिस्से में महामारी का रूप ले लिया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक एच1एन1 वायरस से होने वाला यह फ्लू, सर्दी, बुखार और गले की खराश जैसी मौसमी बीमारियों जैसा ही होता है, लेकिन समय रहते इसकी पहचान नहीं होने पाने के कारण यह जानलेवा साबित हो रहा है।
उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे अनेक राज्यों में स्वाइन फ्लू के बढ़ते मरीजों की लगातार आ रही सूचनाएं यही बताती हैं कि इससे बचने के पुख्ता उपाय नहीं किए जा सके हैं। चिंता की बात यह है कि इस वर्ष महज डेढ़ महीने के दौरान ही स्वाइन फ्लू से 400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और पांच हजार से भी अधिक लोग एच1एन1 वायरस से ग्रस्त हो चुके हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने स्वाइन फ्लू को नियंत्रित नहीं करने की वजह से बढ़ती नाराजगी के कारण स्वास्थ्य मंत्रालय का काम देख रहे अपने उपमुख्यमंत्री को हटा दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष अधिक ठंड पड़ने की वजह से एच1एन1 वायरस को तेजी से पनपने का मौका मिला। लेकिन उनका यह भी कहना है कि एहतियात बरत कर इसके संक्रमण को रोका जा सकता है। ऐसा लगता है कि जनस्वास्थ्य अब भी हमारी प्राथमिकता में नहीं है, नतीजतन हम एक ऐसी बीमारी से भी नहीं निपट सक रहे हैं, जिससे थोड़ी-सी सावधानी रखने से बचा जा सकता है। हालांकि यह भी सच है कि जानकारी के अभाव में खासतौर से ग्रामीण अंचल के मरीज साधारण फ्लू की स्थिति में लापरवाही बरतते हैं और जब तक वे अस्पताल पहुंचते हैं, बात बिगड़ चुकी होती है।
यह विडंबना ही है कि राजधानी दिल्ली तक में स्वाइन फ्लू से पीड़ित एक डॉक्टर को चार घंटे तक एंबुलेंस में सिर्फ इसलिए भटकना पड़ा, क्योंकि किसी सरकारी अस्पताल में आईसीयू में बेड खाली नहीं था। इस बीमारी से बचने का एक सामान्य उपाय स्वच्छता से जुड़ा हुआ है और विडंबना देखिए कि देश में अभी बड़े जोर-शोर से स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है! उम्मीद करनी चाहिए कि इस बार वित्त मंत्री अपने बजट में जनस्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखेंगे।