भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की दोबारा ताजपोशी हो चुकी है। अब बारी केंद्रीय मंत्रिमंडल और भाजपा संगठन के चेहरों में फेरबदल की है। शाह का यह पूर्ण कार्यकाल शुरु से आखिर तक चुनौतियों से भरा होगा। इस साल अप्रैल में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों से लेकर 2019 के लोकसभा चुनावों तक अमित शाह को लगातार सियासी अग्निपरीक्षा के कठिन दौर से गुजरना होगा।
बताया जाता है कि मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सलाह पर फरवरी के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल कर सकते हैं। उसके पहले संभावना है कि 30-31 जनवरी तक अमित शाह अपनी नई टीम बना सकते हैं। मंत्रिमंडल फेरबदल में सरकार केवरिष्ठ मंत्रियों राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी के विभाग नहीं बदले जाएंगे। यह जानकारी भाजपा और संघ से जुड़े बेहद भरोसेमंद सूत्रों ने दी । इन सूत्रों के मुताबिक संघ और पार्टी के बीच तालमेल की जिम्मेदारी संभालने वाले भाजपा के संगठन महासचिव के पद पर भी संघ अपने किसी बेहद भरोसेमंद नए चेहरे को भी पदस्थापित कर सकता है।
संघ से जुड़े एक विचारक के अनुसार इस बार अमित शाह को अध्यक्ष पद पर पूरे तीन साल का कार्यकाल मिला है। अभी तक वह अपने पूर्ववर्ती राजनाथ सिंह के कार्यकाल का बचा हुआ समय पूरा कर रहे थे, जिन्हें केंद्र सरकार में गृह मंत्री बनने की वजह से अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ा था। कहा जा सकता है कि शाह की पिछली पारी एक तरह से राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी केशीर्ष नेतृत्व के पद पर उनका प्रोबेशन काल था और उनका असली कार्यकाल अब शुरु हुआ है। इसलिए अब उनकी असली अग्निपरीक्षा है जो संगठन केभीतर और बाहर दोनों जगह उन्हें देनी है। इसलिए संघ न सिर्फ उन्हें चाक चौबंद करना चाहता है बल्कि संगठन के जरिए अपने वैचारिक एजेंडे को भी मजबूत करते हुए सरकार को अपना कामकाज और सुधारने व जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने का मौका भी खुलकर देना चाहता है। इसलिए प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष दोनों को अपनी टीम में जरूरी फेरबदल करने की पूरी छूट है।
दरअसल अमित शाह का कद लोकसभा चुनावों के बाद एकाएक बढ़ गया था और पहली बार केंद्रीय राजनीति में महासचिव बने शाह को भाजपा अध्यक्ष पद दे दिया गया। क्योंकि लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी सफलता का अधिकतम श्रेय शाह की रणनीति और संगठन क्षमता को ही दिया गया। रातोरात वह भाजपा और मोदी केचाणक्य बना दिए गए। फिर महाराष्ट्र,हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर और झारखंड में भाजपा की चुनावी सफलता ने शाह को और ऊंचाई दे दी। उन्हें पार्टी में मोदी के समानांतर भी माना जाने लगा। उनकी हैसियत वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों और पूर्ववर्ती भाजपा अध्यक्षों से कई गुना बड़ी हो गई। इसलिए दिल्ली विधानसभा और बिहार के चुनावों में शाह ने जो चाहा वही किया। चाहे दिल्ली में किरण बेदी को लांच करने का दांव हो या बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कारपेट बमबारी वाली चुनावी रैलियां, सबकी रणनीति शाह ने ही बनाई। लेकिन दोनों जगह भाजपा बुरी तरह हारी। जाहिर है सफलता का श्रेय अगर शाह को मिला था तो इन दोनों विफलताओं को लेकर पार्टी के भीतर बाहर उंगली भी उन पर उठी। पार्टी के बुजुर्ग नेताओं ने बाकायदा लिखित बयान जारी करके जिम्मेदारी तय करने की मांग की। एकबारगी लगा कि शाह को अगला पूर्ण कार्यकाल शायद न मिल पाए। राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी तक के वैकल्पिक नाम भी हवा में गूंजने लगे।
लेकिन नरेंद्र मोदी अपने विश्वस्त अमित शाह के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे और उन्होंने संगठन और संघ दोनों को साफ कह दिया कि उन्हें अगले लोकसभा चुनावोंं तक पार्टी प्रमुख केरूप में शाह ही चाहिए। मोदी की इच्छा को संघ ने माना और संगठन ने सिर आंखों पर लिया। शाह को बिना किसी बाधा के पूर्ण कालिक कार्यकाल मिल गया। लेकि न उन्होंने अभी पहली बाधा पार की है। अब उनके सामने अपनी ऐसी टीम बनाने की चुनौती है जो इसी साल अप्रैल में होने वाले असम, प.बंगाल, तमिलनाडु, पुद्दुचेरी और केरल केचुनावों में भाजपा का झंडा बुंलद कर सके। हालाकि इन राज्यों में भाजपा का प्रभाव वैसा नहीं है जैसा कि उत्तर भारत में है। लेकिन जिस तरह हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में भाजपा ने पहली बार इतनी बड़ी सफलता पाई, उससे इन राज्यों में भी भाजपा खासी उम्मीदें पाले हुए है। प.बंगाल में भाजपा की कोशिश है कि अगर वह सत्ता में न आ सके तो कम से कम वाम मोर्चा और कांग्रेस को पछाड़ कर प्रमुख विपक्षी दल बन सके। वहीं केरल में पार्टी को कांग्रेस सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान और वाम मोर्चे के ढहते किले की वजह से अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने की उम्मीद है। जबकि तमिलनाडु में भाजपा अन्ना द्रमुक और द्रमुक केबीच कई दलों से गठबंधन करके तीसरी ताकत बनना चाहती है। लेकिन असम में भाजपा पूरे दमखम से सरकार बनाने केलिए चुनावी तैयारियां कर रही है। वहां कांग्रेस से टूटकर आया एक खेमा और कुछ स्थानीय दलों के साथ गठबंधन की ताकत से भाजपा कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी केमुकाबले खुद को ज्यादा ताकतवर बनाने की कवायद में जुटी है। पार्टी ने असम गण परिषद से समझौते का रास्ता भी बंद नहीं किया है।
इसके बाद शाह की अगली चुनौती 2017 में मार्च में होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा केविधानसभा चुनावों की है। इन सभी राज्योंं में भाजपा या तो सरकार में है या विपक्ष में है। पंजाब में अकाली भाजपा गठबंधन सरकार केखिलाफ जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर है और कांग्रेस केसाथ साथ आम आदमी पार्टी भी वहां एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। शाह की अगुआई में भाजपा को इस चक्रव्यूर से निकलना है कि पंजाब में पार्टी अकाली दल केसाथ मिलकर लड़ेगी या अकेले। और अगर अकेले लड़ती है तो क्या सरकार बना पाएगी? जबकि उत्तराखंड में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है जहां मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की जोड़ी की अगुआई में कांग्रेस ने नीचे तक खुद को मजबूत किया है। वहीं भाजपा में अभी भी शीर्ष स्तर पर गुटबाजी चरम पर है जिसकी वजह से मोदी सरकार में उत्तराखंड से भाजपा के पांचों सांसद होने के बावजूद एक भी मंत्री नहीं है। गोआ में भाजपा की सरकार है लेकिन लोकप्रिय मुख्यमंत्री मनोहर परिकर के केंद्र में रक्षा मंत्री बन जाने के बाद भाजपा के सामने सत्ता विरोधी रुझान को अपने पक्ष में बदलने की कड़ी चुनौती है।
उत्तर प्रदेश की सियासी स्थिति खासी जटिल है। लोकसभा चुनावों में अपने सहयोगी दलों के साथ राज्य की 80 में से 73 सीटें जीतने वाली भाजपा के सामने विधानसभा चुनावों में सपा बसपा और कांग्रेस का मुकाबला करने की कठिन चुनौती है। 2002 के विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता से बाहर हुई भाजपा लगातार गिरावट झेल रही है। पार्टी केसामने राज्य स्तर पर न सिर्फ संगठन केकील कांटे दुरुस्त करने की चुनौती है बल्कि राज्य में कोई ऐसा चेहरा भी नहीं है जिसे अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव की संयुक्त ताकत और बसपा नेता मायावती के सामने मुख्यमंत्री केउम्मीदवार केरूप में पेश कर सके। राज्य के सामाजिक और जातीय समीकरण साधना भी आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुख्य जनाधार सवर्ण मतदाता हैं, लेकिन सिर्फ उनके भरोसे पार्टी बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए उसे कल्याण सिंह के जमाने के अपने पिछड़े जनाधार को वापस लाने की जरूरत है वहीं अपने सवर्ण जनाधार को साधे लाने की कठिन चुनौती है। भाजपा इस दुविधा केबीच झूल रही है।
अप्रैल 2016 से लेकर मार्च 2017 तक के सभी विधानसभा चुनावों में भाजपा को अमित शाह की संगठन क्षमता और चुनावी रणनीति को कामयाब बनाने केलिए सबसे बड़ा सहारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और लोकप्रियता है। लेकिन दिल्ली और बिहार में मोदी की छवि और धुआंधार आक्रामक प्रचार भी भाजपा को नहीं बचा सका। लोकसभा चुनाव में जहां मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी और तत्कालीन यूपीए सरकार को जनता हटाना चाहती थी,इसलिए उन चुनावों और उसके तत्काल बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा की कामयाब हुई और उसका सेहरा शाह केसिर बंधा। लेकिन अब जबकि दिल्ली और बिहार की हार केसाथ मोदी की अजेयता का भ्रम टूटा गया है और केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को लेकर भी किंतु परंतु हैं, तब आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की नैया पार लगाने केलिए अमित शाह और उनकी टीम को एड़ी चोटी का जोर लगान होगा। उसके बावजूद सफलता मिलेगी कि नहीं यह सवाल भविष्य के गर्भ में है।
मार्च 2017 के बाद शाह केनेतृत्व वाली भाजपा केसामने अगली चुनौती मोदी और शाह के गृह राज्य गुजरात के चुनाव में होगी जो वर्ष केआखिर दिसंबर में होंगे। मोदी के दिल्ली आने के बाद आनंदी बेन सरकार के राज में गुजरात में भाजपा गंभीर संकट से गुजर रही है। पटेल आंदोलन से उपजी नाराजगी ने भाजपा के मूल जनाधार पटेलों में जबर्दस्त असंतोष पैदा किया है, वहीं राज्य से मोदी का करिश्मा हटने केबाद आनंदी बेन की पार्टी और जनता पर वह पकड़ भी नहीं बची है। फिर आनंदी बेन और अमित शाह केबीच भी खट्टे मीठे रिश्ते पूरे गुजरात में कहे सुने जाते हैं। 2018 मई में कर्नाटक और नवंबर दिसंबर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव भी अग्निपरीक्षा होंगे। कनार्टक में सत्ता वापसी और अन्य तीन राज्यों में अपनी सरकारें बचाना भाजपा केलिए आसान नहीं है। 2018 की चुनावी वैतरणी केबाद अप्रैल मई में 2019 के लोकसभा चुनाव आ जाएंगे, जो शाह केकार्यकाल केअंतिम वर्ष में होंगे। तब केंद्र में दोबारा वापसी की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर ही होगी और उसकी भूमिका पिछले सभी विधानसभा चुनावों के नतीजों से लिखी जा चुकी होगी।