पठानकोट आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मौका ए वारदात का मुआयना करने पठानकोट गए तो उन्होंने आतंकवादियों के मंसूबे नाकाम करने और उन्हें मार गिराने के लिए न सिर्फ सेना और सुरक्षा बलों को शाबासी दी बल्कि इस आपरेशन को पूरी तरह सफल बताया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि इस ऑपरेशन में सुरक्षा बलों, सेना, खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बताते हुए उन तमाम अफवाहों और अटकलों को खारिज कर दिया जिनके मुताबिक यह कहा जा रहा था कि ऑपरेशन में केंद्रीय नेतृत्व और विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल का पूरी तरह अभाव था। प्रधानमंत्री ने यह बात ट्वीट के जरिए कही।
प्रधानमंत्री ने ऐसा करके अपने बेहद भरोसेमंद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की पीठ ठोंकी क्योंकि पठानकोट ऑपरेशन को पूरी तरह डोभाल के द्वारा ही संचालित किया गया था। जबकि ऑपरेशन में तालमेल की कमी और एक केंद्रीय दिशा के अभाव की बात कहने वाले बिना नाम लिए डोभाल पर ही निशाना साध रहे थे। हमले के बाद भारत पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत तय तिथि से आगे बढ़ाने के फैसले में भी डोभाल की राय बेहद अहम रही।
पठानकोट वायुसेना आधार शिविर पर आतंकवादी हमले से निबटने के लिए चले ऑपरेशन को लेकर सुरक्षा विशेषज्ञों की राय अलग अलग है, लेकिन सबसे बड़ा और अनसुलझा सवाल है कि आखिर इस पूरे मामले में गृह मंत्रालय की क्या भूमिका रही। क्योंकि ऑपरेशन के बारे में गृह मंत्रालय को जो आधी अधूरी जानकारी मिली उसके आधार पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट करके आतंकवादियों को मार गिराने के लिए सेना और सुरक्षा बलों की बहादुरी को सलाम करते हुए ऑपरेशन खत्म होने का ऐलान भी कर दिया। जबकि उस वक्त तक सिर्फ चार आतंकवादी मारे गए थे और दो आतंकवादियों की तलाश जारी थी। बाद में गृह मंत्रालय को हकीकत का पता चला तो ट्वीट हटा लिया गया। राजनाथ के ट्वीट के बाद यह आपरेशन दो दिन और चला।
सार्वजनिक रूप से अपनी इस फज़ीहत से आहत राजनाथ सिंह ने पठानकोट ऑपरेशन खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा समीक्षा बैठक में इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि उन्हें और उनके मंत्रालय को अंधेरे में रखा गया जो कि बेहद गंभीर बात है। प्रधानमंत्री की उपस्थिति में जब गृह मंत्री ने बैठक में यह बात कही तो वहां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी मौजूद थे, जो पूरे ऑपरेशन की कमान संभाल रहे थे। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने खामोशी से अपने गृह मंत्री की बात सुनी और सहमति जताई कि यह चूक गंभीर है।
पठानकोट ऑपरेशन के बाद मोदी सरकार में अजीत डोभाल के रुतबे और भूमिका पर सार्वजनिक बहस भी शुरु हो गई है। 1969 बैच के केरल कॉडर के आईपीएस अधिकारी रहे डोभाल ने अपनी सेवा का अधिकतम समय खुफिया एजेंसी आईबी और रॉ में बिताया है। उन्हें खुफिया ऑपरेशनों का महारथी माना जाता है। मिजोरम में लालडेंगा से लेकर पंजाब में खालिस्तानी आतंकवादियों, जम्मू कश्मीर के उग्रवादियों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के मंसूबों को नाकाम करने वाले अभियानों के संचालन का श्रेय डोभाल को खुफिया जगत में दिया जाता है। उन्हें खुफिया एजेंसियों में मैन ऑफ दि ऑपरेशन के नाम से जाना जाता है। उनकी छवि एक सख्त और बेहद सतर्क खुफिया अधिकारी की रही है। इसीलिए वाजपेयी सरकार के दौरान एअर इंडिया के विमान आईसी 814 के अपहरण के मामले को निबटाने की जिम्मेदारी डोभाल को दी गई थी। आतंकवादियों से बातचीत के लिए उन्हें कंधार भेजा गया था और वह उन्हें समझाने व विमान यात्रियों की सुरक्षित रिहाई में सफल रहे थे। वाजपेयी सरकार के जमाने में ही डोभाल को भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी का निदेशक बनाया गया।
यूपीए के दस साल के शासन के दौरान आईबी से सेवा निवृत्त हुए डोभाल ने विवेकानंद फाऊंडेशन की जिम्मेदारी संभाली और उन्होंने संघ की विचारधारा के अनुरूप उसे एक प्रभावशाली थिंक टैंक का स्वरूप दिया। यूं तो वाजपेयी सरकार के दौरान डोभाल तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के बेहद भरोसेमंद और निकटवर्ती अधिकारी थे और अगर 2009 में आडवाणी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा सरकार बनती तो डोभाल तभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बन गए होते। इसलिए जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के लिए जिस अकेले नाम पर मुहर लगी वह अजीत डोभाल का ही था।
वह न सिर्फ संघ के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी विचारों के करीब हैं, बल्कि स्वभाव और कार्यशैली में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनका बहुत बेहतर तालमेल है। मोदी को अपने सभी अधिकारियों में सबसे ज्यादा भरोसा डोभाल पर ही है। इसलिए उनकी सरकार में वही भूमिका है जो वाजपेयी सरकार में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र की थी। हालाकि मिश्र प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव भी थे। लेकिन डोभाल सिर्फ एनएसए रहते हुए भी लगभग उतने ही ताकतवर हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति, सुरक्षा नीति और रणनीति तीनों के अकेले सूत्रधार वही हैं। सरकार के ताकतवर माने जाने वाले मंत्री भी डोभाल की धमक काबिलियत और मोदी के साथ उनकी निकटता का लोहा मानते हैं।
चीन, पाकिस्तान, नेपाल, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, अमेरिका, यूरोप, जापान, हर यात्रा में डोभाल प्रधानमंत्री के साथ रहते हैं। काबुल से लौटते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नवाज़ शरीफ से अचानक मिलने जाने की सालगिरह कूटनीति का सूत्रधार भी उन्हें ही माना जाता है। सूत्र यह भी बताते हैं कि अपने शपथ ग्रहण में पाकिस्तान समेत सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करने का फैसला मोदी ने डोभाल की सलाह पर ही लिया था। डोभाल को यह राय खुफिया जगत में बेहद चर्चित रहे उनके ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने दी थी। लेकिन डोभाल की आंतरिक सुरक्षा नीति को लेकर उनके आलोचक और विरोधी सवाल भी उठाते हैं। खुफिया जगत में उनके पुराने साथी कहते हैं कि डोभाल जितना करते नहीं उससे ज्यादा प्रचार करते हैं। छोटे ऑपरेशन को उलझाकर बड़ा करना और फिर उसकी कामयाबी का श्रेय लेना भी उनकी फितरत है। उनकी इस कार्यशैली की वजह से कई बार खुफिया एजेंसियों को परेशानी भी उठानी पड़ी। लेकिन गोपनीयता के कारण यह बातें बाहर नहीं आईं। जबकि उनकी कामयाबी के किस्से खूब बढ़ा चढ़ाकर प्रचारित किए गए।
एक पूर्व उच्च स्तरीय खुफिया अधिकारी का कहना है कि डोभाल की आदत सब कुछ खुद ही करने की है जिसकी वजह से उनकी टीम हमेशा बेहद दबाव में रहती है और पूरी तरह उनके आदेशों और निर्देशों पर ही निर्भर रहती है। इस अधिकारी के मुताबिक इन दिनों दोनों खुफिया एजेंसियों के शीर्ष स्तर के सभी अधिकारी डोभाल के अधीन कभी न कभी काम कर चुके हैं और वह उनकी कार्यशैली से बखूबी परिचित हैं। इसलिए वह ज्यादातर अपने विवेक से काम लेने की जगह उनके निर्देशों का पालन करने में ही ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। इससे एजेंसियों में एक जड़ता आ गई है। खुफिया जगत के अधिकारी कहते हैं मोदी सरकार बनने के बाद 26 जनवरी से पहले गुजरात में जिस कथित आतंकवादी नाव में आग लगने की घटना को जिस तरह प्रचारित किया गया,उससे दुनिया में सरकार की खासी किरकरी हुई।
इसी तरह जिस तरह सरकार ने आधी रात को एक मंत्री की प्रेस कांफ्रेंस कराकर म्यांमार में घुसकर नगा उग्रवादियों के शिविर को ध्वस्त करने का दावा किया जिसका बाद में म्यांमार सरकार ने पूरी तरह खंडन किया और फिर भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने भी अपनी रिपोर्ट में लगभग यही बात कही। इससे भी सरकार की खासी किरकरी हुई। और अब पठानकोट वायुसेना आधार शिविर में जिस तरह खुफिया सूचनाएं होने केबावजूद आतंकवादी घुसने में कामयाब हुए और हमारे सात जवान शहीद हुए और कुछ घायल हुए, और इस ऑपरेशन में जिस तरह तालमेल के अभाव की खबरें आईं, उसने भी सरकार की आंतरिक सुरक्षा नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचक इन सबके लिए डोभाल की कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह पठानकोट ऑपरेशन को कामयाब बताते हुए डोभाल को अभयदान दिया है, उससे साफ संकेत है कि सरकार में डोभाल का रुतबा और दबदबा अभी जारी रहेगा।