आज लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही नई सरकार की तस्वीर साफ हो जाएगी। चुनावी सर्वेक्षणों, एग्जिट पोल और राजनीतिक विश्लेषकों के आकलन में उम्मीद जताई जा रही है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई में एनडीए सरकार की ताजपोशी महज औपचारिकता है। मतभेद सरकार की मजबूती और उसके स्वरूप को लेकर है।
उल्लेखनीय यह है कि 1989-90 से गठबंधन की सरकारें देश की राजनीतिक हकीकत बन चुकी हैं। बेशक, 1991 में नरसिंह राव की अगुआई में कांग्रेस ने सरकार बनाई थी, पर उसे भी जोड़-तोड़ कर झारखंड मुक्ति मोर्चा और लोकदल जैसे संगठनों का समर्थन जुटाना पड़ा था। 1996 के बाद से तो देश में पूरी तरह से गठबंधन सरकारें ही बन रही हैं और डेढ़ दशक पहले तक क्षेत्रीय दलों को हिकारत से देखने वाली कांग्रेस तक को इस हकीकत को स्वीकार करना पड़ा है।
1999 से 2004 के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार और बीते एक दशक के दौरान मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के अनुभव भावी सरकार के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। एनडीए और यूपीए, दोनों सरकारों को कार्यकाल के दौरान छोटे दलों की राजनीति का स्वाद चखना पड़ा है। दरअसल गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी चुनौती सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाकर चलने की होती है, जिसकी वजह से कई अहम फैसले टालने पड़ते हैं, तो सरकार पर मनमाने फैसले लेने पर अंकुश भी लगता है।
मसलन, ममता बनर्जी की जिद के कारण यूपीए को खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का फैसला टालना पड़ा था और यहां तक कि बजट पेश करने के तुरंत बाद रेल मंत्री तक को बदलना पड़ गया था। वहीं, दक्षिण की राजनीति के कारण श्रीलंका पर सरकार की नीति को प्रभावित होते भी देखा गया है। भावी सरकार के लिए दो सबक हो सकते हैं। पहला यह कि अटल बिहारी वाजपेयी ने शिद्दत से गठबंधन धर्म निभाया, मगर मंत्रिमंडल के गठन तक में उन्हें सहयोगियों का दबाव झेलना पड़ा।
दूसरा सबक, मनमोहन सिंह के कार्यकाल से कि वह खुद तो ईमानदार बने रहे, मगर 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे कई मामलों में उन्होंने सामूहिक जिम्मेदारी से बचने से गुरेज नहीं किया। जाहिर है, गठबंधन धर्म और सामूहिक जिम्मेदारी भावी सरकार के लिए मंत्र हो सकते हैं।