वर्षों से बिहार की राजनीति से बेदखल लालू प्रसाद यादव को अचानक वहां की याद आई है! राजनीति में कोई भी कदम यों ही नहीं उठाया जाता। माना जाना चाहिए कि यूपीए में नीतीश कुमार की बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत लालू बिहार में अपनी जड़ मजबूत करने निकल पड़े हैं।
बिहार को पिछड़े राज्य का दर्जा दिलाने के लिए नीतीश कुमार द्वारा चलाए गए अभियान से भी वह अलग-थलग पड़े हैं। इसमें शक नहीं कि वहां नीतीश कुमार की पकड़ भी कुछ ढीली पड़ी है। लेकिन याद नहीं आता कि वहां जदयू-भाजपा गठबंधन सरकार के करीब आठ वर्षों के शासन में राजद ने कभी जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अदा की हो।
ऐसे में बेटों को राजनीति में लाने का फैसला और ठेके पर काम कर रहे शिक्षकों को स्थायी करने का आश्वासन उन्हें सत्ता में नहीं ला सकता, यह लालू प्रसाद जैसे अनुभवी राजनेता भी जानते होंगे। पर लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बनाना न सिर्फ उनकी मजबूरी है, बल्कि रैली के जरिये वह राज्य में अपने खोए जनाधार की कमोबेश वापसी की उम्मीद भी कर ही सकते हैं।
चुनावी लाभ लेने के उद्देश्य से ऐसे अभियान चलाने वाले लालू अकेले नहीं हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले वसुंधरा राजे की सुराज संकल्प यात्रा और कांतिलाल भूरिया की कांग्रेस परिवर्तन यात्रा को भी इसी तरह देखना चाहिए। विपक्षी पार्टियों द्वारा शुरू की गई इन यात्राओं का उद्देश्य भी सत्ता हासिल करना है, हालांकि इनमें पूरे विपक्ष की ताकत नहीं, बल्कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और पार्टी में आंतरिक धड़ेबंदी की झलक ही ज्यादा दिखती है।
इससे उलट सत्ता बनाए रखने के लिए छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने विकास यात्रा प्रारंभ की है, तो केंद्र की यूपीए सरकार अपनी दूसरी पारी के चार साल पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत निर्माण अभियान की शुरुआत की है, जिसका मकसद विज्ञापनों के जरिये उपलब्धियों का प्रचार करना है।
कर्नाटक की जीत से उत्साहित यूपीए भले सातवें आसमान पर हो, पर उसे भूलना नहीं चाहिए कि नौ साल पहले राजग सरकार का ठीक ऐसा ही अभियान उसके गले का फंदा बन गया था। इसलिए सिर्फ रैलियां या यात्राएं चुनावी नैया पार करने की गारंटी नहीं हो सकतीं।