अपनी आखिरी पारी में शून्य पर आउट होकर पैवेलियन लौटते डॉन ब्रेडमैन के आगे-पीछे कैमरे नहीं थे। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को उनके अंतिम मैच में सम्मानित करने का किसी को ध्यान नहीं था, लिहाजा खेल खत्म होने के बाद बंगाल हॉकी एसोसिएशन ने उनका सम्मान किया था। लगभग ढाई दशक पहले बंगलूरू की आखिरी टेस्ट पारी में छियानबे रन बनाकर भी सुनील गावस्कर अपनी टीम की हार नहीं टाल पाए थे! यह जरूर है कि उनके मैदान छोड़ते समय दर्शक सम्मान में खड़े हो गए थे और खिलाड़ी कतारबद्ध। इस लिहाज से देखें, तो सचिन रमेश तेंदुलकर का विदाई टेस्ट मैच वाकई यादगार है।
सिर्फ यही नहीं कि अपना आखिरी टेस्ट मैच वह अपने घरेलू मैदान मुंबई में खेल रहे हैं, केवल इतना ही नहीं कि विश्व भर के क्रिकेट दिग्गज उनके योगदान और उपलब्धियों की चर्चा कर रहे हैं, बल्कि दुनिया के एक बड़े हिस्से का ध्यान भी उनके आखिरी मैच पर लगा है।
जहां क्रिकेट चलन में नहीं है, उस अमेरिका तक में तेंदुलकर के विदाई टेस्ट को मिलता महत्व बताता है कि लगभग ढाई दशक के उनके गौरवशाली क्रिकेट करियर के दौरान राष्ट्र को भी एक ठोस पहचान मिली है। इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार द्वारा सचिन के संन्यास की तुलना महात्मा गांधी के जीवनावसान से करने की कोशिश से सहमत नहीं हुआ जा सकता।
यह सही है कि एक पीढ़ी ने सचिन को खेलते देख क्रिकेट को सीखा और जिया है, इससे भी इनकार नहीं कि खेल में प्रतिभा और अनुशासन का ऐसा उज्ज्वल दृष्टांत दूसरा नहीं होगा, यह भी तथ्य है कि बाजार और मीडिया की ताकत के दौर में उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया, पर उनकी विदाई उदासी के बावजूद शोक या विलाप का अवसर तो कतई नहीं है। बापू का जाना तुरंत आजाद हुए देश के लिए एक गहरा सदमा था, लेकिन सचिन जब विदा हो रहे हैं, तब कई संभावनाशील क्रिकेटर भारतीय टीम में हैं।
जाहिर है, इसमें बड़ा योगदान खुद सचिन का भी है, जिनकी उपलब्धियों ने अनेक युवाओं को उनकी तरह बनने को प्रेरित किया। इस लिहाज से यह संतोषजनक है कि भारत ही नहीं, बल्कि पूरा क्रिकेट विश्व उन्हें उसी सम्मान से विदा कर रहा है, जिसके वह हकदार हैं।