देश के कई हिस्सों में मानसून की बारिश ने अब भले ही दस्तक दी है, पर इसके विलंब से आम जनजीवन, खेती-किसानी और अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई शायद ही संभव है। अनुमान के मुताबिक, जून में वर्षा 42 प्रतिशत कम हुई है, जिस कारण खरीफ फसल की बुआई या तो नहीं हो पाई या बोई गई फसल बारिश के अभाव में सूख गई।
अनेक जगहों में तो किसान अब भी बारिश का इंतजार ही कर रहे हैं। विलंबित मानसून के कारण पश्चिमी भारत, खासकर विदर्भ में सूखे की आशंका से खुद कृषि मंत्री इन्कार नहीं कर रहे, तो इसकी वजह है। सिर्फ यही नहीं कि महाराष्ट्र के अनेक जिलों में सूखे जैसे हालात हैं, बल्कि पानी की कमी को देखते हुए बृहन्नमुंबई नगर निगम को पेयजल आपूर्ति में फिलहाल बीस फीसदी कटौती करने का फैसला लेना पड़ा है!
महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश आदि उन राज्यों में से हैं, जहां खेती सिंचाई की तुलना में वर्षा पर अधिक निर्भर रहती है। वर्षा के अभाव में इन राज्यों में धान, सोयाबीन, कपास, दलहन आदि की बुआई प्रभावित हुई है, तो सूखे जैसी स्थिति के कारण गुजरात, पंजाब और हरियाणा के मेवात में दूध का उत्पादन घट गया है।
इसी तरह आलू-प्याज का पर्याप्त स्टॉक होने के सरकारी दावे के बावजूद प्याज समेत तमाम सब्जियों के दाम ऊपर चढ़ने शुरू हुए हैं। यह स्थिति केंद्र की उस नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बेहद चिंतनीय होनी चाहिए, जो करीब एक सप्ताह बाद बजट पेश करने वाली है।
हालांकि उसने जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठाने के अलावा राज्य सरकारों को सूखे से निपटने की आपात योजना बनाने के लिए भी कहा है, पर इसका कितना असर होगा, यह देखना अभी बाकी है। अमेरिका-यूरोप की खराब आर्थिक स्थिति और इराक संकट के बाद अब कृषि क्षेत्र से भी नाउम्मीदी बेहद हताश करने वाली है।
जाहिर है, पहले से बढ़ रही महंगाई के बीच अब खाद्य मुद्रास्फीति का ऊपर उठना जारी रहेगा, कृषि उत्पादों का निर्यात घटेगा और आने वाले दिनों में सोने-चांदी से लेकर वह औद्योगिक मांग भी घटेगी, जो बेहतर कृषि उत्पादन के कारण पैदा होती है। अमूमन हमारा कृषि क्षेत्र ही अर्थव्यवस्था को गति देता है, पर इस बार तो यह संभावना भी खत्म होती दिखाई दे रही है।