उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के 879 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा के बाद सूबे की निजी चीनी मिलें पेराई के लिए भले ही राजी हो गई हैं, पर यह कोई स्थायी समाधान नहीं है।
हर वर्ष इस मौसम में चीनी मिलों और गन्ना किसानों के बीच टकराव की स्थिति बन जाती है, इसके बावजूद केंद्र और राज्य सरकार कोई सर्वमान्य फॉर्मूला ढूंढ नहीं पातीं। अब भी चीनी मिलें तो चालू हो जाएंगी, लेकिन ठोस समझौते के अभाव में टकराव की स्थिति बनी हुई है; किसान नेता नरेश टिकैत ने आंदोलन जारी रखने का ऐलान कर इसका संकेत दे ही दिया है।
30,000 करोड़ रुपये से अधिक के चीनी उद्योग के साथ सूबे के पचास लाख किसान परिवारों के हित जुड़े ही हैं; राज्य की अर्थव्यवस्था की यह रीढ़ भी है। इसके बावजूद न तो केंद्र और न ही राज्य सरकार इस मसले का सर्वमान्य रास्ता निकालना चाहती हैं। हालत यह है कि नवंबर में गन्ने की पेराई शुरू नहीं हो सकने की वजह से लाखों हेक्टेयर में गेहूं और दाल की बुआई नहीं हो सकी है, जिससे आसन्न संकट का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसके अलावा उस धुरी को भी समझने की जरूरत है, जिसके सहारे किसानों और व्यापारियों की जिंदगी का पहिया चलता है। पिछला भुगतान नहीं होने से एक ओर तो किसान बैंकों से लिए 180 अरब रुपये के कर्ज का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं, दूसरी ओर इसका असर ऑटोमोबाइल से लेकर उपभोक्ता सामानों और सीमेंट जैसे व्यापारों तक पर पड़ रहा है। गन्ने की बुआई जब सरकार खुद तय करती है, तो फिर खेतों में खड़े गन्ने की जिम्मेदारी से वह क्यों बचती है? वह यह क्यों सुनिश्चित नहीं कर सकती कि किसानों को सरकारी दरों पर ही भुगतान किया जाए।
इस गतिरोध का असर छोटे किसानों पर पड़ता है, जिन्हें अपना गन्ना सरकारी दर 280 रुपये से आधे से भी कम 120 रुपये क्विंटल तक कोल्हुओं को बेचना पड़ता है! असल में पूरे देश में चीनी उद्योग में व्याप्त असंतुलन को दूर करने की जरूरत है। इसके अलावा उस लॉबी पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है, जिसके दबाव में चीनी आयात करनी पड़ती है और जिसकी वजह से असंतुलन पैदा होता है। जो किसान गन्ना पैदा करता है, उसके जीवन में मिठास क्यों नहीं होनी चाहिए?