एम. करुणानिधि ने पार्टी की एक बैठक में बृहस्पतिवार को जो संकेत दिए हैं, उसका साफ मतलब है कि उनके तीसरे पुत्र एम स्टालिन ही उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी होंगे। इसकी औपचारिक घोषणा भले न की गई हो, लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कषगम के भीतर और बाहर इसे लेकर कभी संदेह नहीं रहा है। मुश्किल करुणानिधि के अपने कुनबे में है, जहां उनके दूसरे बेटे और केंद्रीय मंत्री अलागिरी और उनकी तीसरी पत्नी से हुई बेटी और राज्यसभा सदस्य कणिमोझी भी खुद को पिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखती रही हैं।
ऐसा लगता है, मानो द्रमुक राजनीतिक दल न होकर कोई पैतृक संपत्ति हो! इसमें हम भारतीय राजनीति की विसंगतियों और उसकी विवशताओं को भी देख सकते हैं। जब यह खबर आई है, तभी आंध्र प्रदेश में वापसी के लिए राजनीतिक अभियान छेड़ने वाले चंद्रबाबू नायडू के अपनी 'पदयात्रा' में बहू को भी साथ रखने की खबरें आई हैं। वैसे द्रमुक कोई अपवाद नहीं है, कांग्रेस से लेकर नेशनल कांफ्रेंस, सपा, शिवसेना, राजद, बीजू जनता दल, जनता दल (एस), लोकदल और इनेलो जैसी न जाने कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं, जिनमें फैलती वंशबेल देखी जा सकती है।
वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन का संघर्ष भी अंततः अपने पिता की राजनीतिक विरासत पर कब्जे से ही जुड़ा है। लेकिन करुणानिधि परिवार के बहाने हम एक बार फिर यह देख सकते हैं कि भारतीय राजनीति में वंशवाद किस तरह हावी होता जा रहा है। हैरत की बात यह है कि पेरियार और अन्नादुरई जैसे महान सामाजिक सुधारकों के साथ राजनीति शुरू करने वाले करुणानिधि को भी अंततः पुत्र में ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी नजर आया है।
करुणानिधि ने कहा है कि वह अंतिम दम तक दलितों के उत्थान के लिए संघर्ष करते रहेंगे, और उनके बाद इस संघर्ष को उनके बेटे स्टालिन आगे बढ़ाएंगे। उनकी इस वैचारिक और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से किसी को ऐतराज नहीं हो सकता, मगर यह सबने देखा है कि किस तरह उन्होंने 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अपनी बेटी कणिमोझी को बचाने के लिए राजनीतिक सौदेबाजी की थी। बहरहाल, करुणानिधि ने स्टालिन का नाम ऐसे समय आगे किया है, जब दो दिन बाद ही द्रमुक के जिला सचिवों की 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के मद्देनजर बैठक होनी है। कहने की जरूरत नहीं कि पांच बार मुख्यमंत्री रहे करुणानिधि की इस राजनीतिक पटकथा के निहितार्थ क्या हैं।