पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में जारी हिंसा ने फिर साबित किया है कि प्रदेश की सत्ता में तृणमूल कांग्रेस के काबिज होने के दो वर्षों के बाद भी वहां की राजनीतिक संस्कृति नहीं बदली है। चौथे चरण के मतदान के बाद तक हिंसा में दस से अधिक लोगों के मारे जाने, सैकड़ों घरों में तोड़फोड़ और आगजनी तथा बम फेंकने की घटनाएं यही बता रही हैं कि हालात पर राज्य सरकार का नियंत्रण नहीं है।
बेशक, पंचायत चुनावों को शांतिपूर्ण संपन्न कराने की जिम्मेदारी राज्य चुनाव आयोग की है, लेकिन यह बात बार-बार सामने आ रही है कि उसे राज्य सरकार की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। दरअसल यह चुनाव ममता बनर्जी और राज्य निर्वाचन आयोग के आपसी टकराव के बीच हो रहे हैं, जिसमें सर्वोच्च अदालत तक को निर्देश देने पड़े। ममता चाहती थीं कि पंचायत चुनाव उनकी सरकार की देखरेख में हों और इन्हें एक या दो चरणों में ही निपटा लिया जाए, मगर अदालत के निर्देश पर राज्य निर्वाचन आयोग पांच चरणों में चुनाव करा रहा है।
वास्तव में राजनीतिक रूप से अतिसक्रिय पश्चिम बंगाल में कोई भी चुनाव कराना आसान नहीं। वहां का मिजाज भी कुछ ऐसा हो गया है कि निचले स्तर तक निजी दुश्मनी की हद तक राजनीति होती है। वाम मोर्चे के शासन ने पूरी व्यवस्था का राजनीतिकरण कर दिया था, जिसका असर पंचायतों तक दिखता है। और जब आवंटन भी पार्टी कैडर के आधार पर होने लगा, तो आपराधिक तत्वों को प्रश्रय भी मिलने लगा।
जो आपराधिक तत्व कल तक माकपा के साथ थे, आज तृणमूल के साथ हैं। इन चुनावों ने ममता की राजनीति के अंतरविरोधों को भी उजागर किया है कि किस तरह उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर में भूमि अधिग्रहण का विरोध किया और उसके लिए माओवादियों का समर्थन लेने से भी उन्होंने परहेज नहीं किया था।
आज बीरभूम जिले में एक कोयला परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण किए जाने की वजह से वही लोग उनके उम्मीदवारों के खिलाफ खड़े हैं, जो कल तक उनके साथ थे! ममता को यह समझना चाहिए कि कानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी उनकी सरकार की है और वह अपने राजनीतिक विरोधियों या निर्वाचन आयोग को दोष देकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकतीं।