ष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रहीं ममता बनर्जी को दिल्ली में अन्ना हजारे के साथ उनकी पार्टी की बहुप्रचारित संयुक्त रैली की नाकामी से तगड़ा झटका लगा होगा। मगर इसने ममता और अन्ना के बेमेल गठजोड़ की कलई भी खोलकर रख दी है।
हालत यह है कि दोनों ओर से रैली की नाकामी का ठीकरा एक दूसरे पर फोड़ा जा रहा है। हैरानी की बात है कि पखवाड़े भर पहले ही अन्ना ने ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद के योग्य बताया था। उनके साथी भले ही सफाई दे रहे हैं कि अन्ना अस्वस्थ होने के कारण रैली में नहीं आए, लेकिन यदि भाजपा में शामिल हो चुके अपने पुराने सहयोगी जनरल वी के सिंह से उनकी मुलाकात की खबरें सच हैं, तो संघ परिवार से उनकी नजदीकी की अटकलों को ही बल मिलता है।
असल में इससे अन्ना हजारे की राजनीति पर भी सवाल उठते हैं, क्योंकि प्रत्यक्षतः तो वह राजनीति में शामिल होने के खिलाफ रहे हैं और पिछले वर्ष आम आदमी पार्टी के गठन के कारण ही अरविंद केजरीवाल तथा उनके रास्ते अलग हुए थे। इसमें दो राय नहीं कि लोकपाल आंदोलन के समय पूरे देश में जो माहौल बना था, उसमें अन्ना हजारे की छवि और अरविंद केजरीवाल की रणनीति का बड़ा योगदान था। मगर दो वर्ष पूर्व जिस रामलीला मैदान में अन्ना और अरविंद के लोकपाल आंदोलन ने अपना चरम देखा था, वहां अन्ना के आने की सूचना के बावजूद लोग नहीं जुटे!
असल में उस आंदोलन के बाद से अन्ना एक ढुलमुल व्यक्तित्व के रूप में ही सामने आए हैं। खुद की प्रासंगिकता तलाश रहे अन्ना हजारे को समझना चाहिए कि मैदान से बाहर रहकर आप खेल की दिशा नहीं मोड़ सकते। जहां तक ममता की बात है, तो वह अब पश्चिम बंगाल से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में आना चाहती हैं। थोड़े दिन पहले उन्होंने जयललिता को जिस तरह से प्रधानमंत्री पद के योग्य बताया था, वह उनकी इसी रणनीति का हिस्सा लगता है।
अलबत्ता ममता ने लोगों की कमजोर उपस्थिति के बावजूद रैली में नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले किए और उन्हें सांप्रदायिक तक करार दिया, जबकि मोदी ने कोलकाता की अपनी रैली में उनके प्रति काफी नरमी बरती थी। लाख टके का सवाल है कि क्या मंच पर उपस्थित रहकर अन्ना यह सब बर्दाश्त कर पाते?