अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे के बाद जो लोग दोनों देशों के बीच मजबूत होते रिश्ते से उत्साहित हैं, उन्हें सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में बराक ओबामा द्वारा की गई टिप्पणी पर भी गौर फरमाना चाहिए, जिसमें उन्होंने धार्मिक सद्भाव बनाए रखने की जरूरत बताई है। दुनिया का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हमारे यहां गणतंत्र दिवस पर आता है, और जाते-जाते सहिष्णुता की हमारी संस्कृति और संविधान के अनुच्छेद 25 की याद दिला जाता है, तो यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है।
जाहिर है कि केंद्र में नई सरकार आने के बाद से धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की जो लगातार कोशिशें हुई हैं, उनसे दुनिया के कान खड़े हुए हैं। ओबामा की नसीहत को इसी संदर्भ में समझना चाहिए। यह सफाई देने से काम नहीं चलेगा कि ओबामा की उस नसीहत का हमारी सरकार की रीति-नीतियों से कोई लेना-देना नहीं है। ग्लोबल दुनिया में यह कहने से भी काम नहीं चलने वाला कि हमारी नीतियों और कामकाज पर किसी बाहरी को आवाज उठाने का हक नहीं। पर ऐन गणतंत्र दिवस के दिन छपे सरकारी विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना में 'सोशलिस्ट' और 'सेक्यूलर' शब्दों की गैरमौजूदगी से उपजे विवाद पर सरकार का रवैया बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं है।
बेशक गणतंत्र दिवस के दिन संविधान की मूल प्रस्तावना का विज्ञापन गलत नहीं है। एक तर्क यह भी है कि 1976 में, आपातकाल के दौरान, इंदिरा गांधी की वह पहल उनके आचरण के दोहरेपन का सुबूत थी, और वह यह पहल न करतीं, तो भी हमारा संविधान उतना ही धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी होता, जितना कि वह पहले से था। शायद यही सोचते हुए सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री ने यह तर्क रखा कि इससे पहले भी संविधान की मूल प्रस्तावना का विज्ञापन छपा था। उनका कहना सही है, पर वह भूलते हैं कि मौजूदा विवाद की वजह वह आशंका है, जो इस सरकार की सोच की वजह से पैदा हुई है।
यह विवाद सामने आने के बाद शिवसेना ने इन दोनों शब्दों को हमेशा के लिए हटा देने की मांग की है। वैसे तो किसी के चाहने या न चाहने से हमारे संविधान का मूल चरित्र बदलने वाला नहीं है, पर अच्छा यह होता कि अपने गठबंधन सहयोगी की इस मंशा की सरकार तीखी आलोचना करती। शिवसेना की मांग पर चुप्पी जताकर मोदी सरकार अपने बारे में व्याप्त आशंका को और बढ़ाने का ही काम करेगी।