नेपाल से पानी छोड़े जाने के कारण उससे सटे उत्तर प्रदेश के कई जिले बाढ़ की चपेट में न सिर्फ आ गए हैं, बल्कि अचानक आई इस आपदा ने लोगों को संभलने का मौका भी नहीं दिया है। घाघरा, राप्ती और सरयू में आए उफान से सैकड़ों गांव पानी में डूब गए, जिससे जानमाल की व्यापक क्षति हुई है और लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। महीने-डेढ़ महीने पहले तक क्षेत्र में मानसून की वर्षा कम होने के कारण सूखा पड़ने और बुआई घटने की चर्चा थी, पर आज जलप्रलय से घर और खेत डूब जाने की चिंता उससे कई गुना अधिक है।
ऊंचे और सुरक्षित जगहों की तलाश में सिर्फ मनुष्य नहीं हैं, जान बचाकर भागते हुए पशु भी हैं, क्योंकि दुधवा टाइगर रिजर्व जैसे वन्यजीवों के कई सुरक्षित ठिकाने भी बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। मानसून के इस मौसम में यहां के लोगों के लिए पानी से लड़ते हुए जिंदा रहना नया नहीं है, पर नेपाल से आई तबाही ने इस बार इनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। बाढ़ की ऐसी ही चुनौती का सामना बिहार भी कर रहा है और असम भी।
पहले से बारिश का प्रकोप झेल रहे उत्तराखंड में भी स्थिति भीषण है। मूसलाधार वर्षा, भूस्खलन और बादल फटने से पौड़ी, देहरादून, टिहरी और हरिद्वार में भारी तबाही मची है। भूस्खलन से ज्यादातर सड़क मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं, तो अनवरत वर्षा से अनेक जगह बिजली की आपूर्ति बाधित है और मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। उत्तराखंड की त्रासदी तो और भीषण है, क्योंकि वहां भूस्खलन या बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित लोगों को राहत पहुंचाने का काम भी आसान नहीं है।
इसी तरह बाढ़ के कारण अपना घर छोड़ चुके लोगों में से अनेक की असली चुनौती पानी उतर जाने के बाद तब शुरू होगी, जब उन्हें नए सिरे से अपना जीवन शुरू करना पड़ेगा। केंद्र सरकार ने हालांकि बाढ़ पीड़ित राज्यों की हरसंभव मदद करने का भरोसा दिया है। बाढ़ग्रस्त राज्यों की आपात बैठक इसी सिलसिले में बुलाई गई है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का भले कोई तात्कालिक समाधान न हो, पर बाढ़ पीड़ितों की तकलीफ तो कम की ही जा सकती है। इसके अलावा नेपाल के साथ बातचीत में इस दिशा में गंभीरता से सोचा जा सकता है कि साझा प्रयासों से भविष्य में बाढ़ की भयावहता को किस तरह कम किया जा सकता है।