नारों में अपनी मौलिकता दिखाने वाले नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले एक अच्छा जुमला गढ़ा था-'पहले शौचालय, फिर देवालय।' देश के सभी सरकारी स्कूलों को शौचालय की सुविधा से जोड़ने की प्रक्रिया वैसे तो पिछली यूपीए सरकार के समय से ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसमें खासी तेजी आई।
आम तौर पर पूरे देश में, और खासकर उत्तर प्रदेश में शौचालय की सुविधा न होने पर ससुराल न जाने वाली नवविवाहिताओं को भी सरकार की इस पहल से नई ऊर्जा मिली।
अलबत्ता शौचालयों को महत्व देते इक्कीसवीं सदी के इस भारत का एक दूसरा चेहरा भी है। भारतीय रेल दुनिया भर में अपनी क्षमता के लिए जानी जाती है। केंद्र की नई सरकार इसे जिस तरह नित नई कॉरपोरेट लुक दे रही है, उससे लगता है कि वह भारतीय रेल की पुरानी जर्जर छवि तोड़कर नई छवि गढ़ना चाहती है।
बुलेट ट्रेन की योजना, भोजन और बिस्तर की नई लकदक व्यवस्था, ट्विटर पर सूचना देने पर भोजन से लेकर दूध की बोतल और दवा की उपलब्धता-ये भारतीय रेल की परीकथा जैसी छवि गढ़ती हैं। लेकिन इसी भारतीय रेल के करीब 69,000 ड्राइवर दशकों से इंजन में शौचालय की मांग करते हुए अब मानवाधिकार आयोग की शरण में पहुंचे हैं! एक तरफ रेल के डब्बों में आधुनिकतम शौचालयों की व्यवस्था की जा रही है।
बायो टॉयलेट इस दिशा में नया कदम है। लेकिन रेलगाड़ियों को गंतव्य तक ले जाने की बड़ी जिम्मेदारी जिनके कंधे पर है, वे ड्राइवर शौचालयों से वंचित हैं! यही नहीं, अगर रिपोर्टों पर विश्वास करें, तो शौचालयों की उनकी मांग लगातार खारिज की जाती रही है।
इसके ब्योरे हैं कि पिछली यूपीए सरकार में रेल मंत्री रहे पवन कुमार बंसल ने इस मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया था। लेकिन अगर इस दिशा में सचमुच कुछ होता, तो ये ड्राइवर हताशा में मानवाधिकार आयोग में क्यों जाते? शौचालय की सुविधा से किसी को वंचित करना दरअसल जीने के अधिकार का हनन है।
शौच न जा पाने की पीड़ा क्या होती है, यह ग्रामीण भारतीय महिलाओं से पूछना चाहिए है। 'पहले शौचालय...' के इस दौर में ही देश के गांवों में अनेक महिलाएं होंगी, जो मुंह अंधेरे जंगल जाने के बाद देर रात ही निबटने जा सकती हैं। जीवन भर इस विवशता को भोगने का खामियाजा वे अपने शरीर पर भी भुगतती हैं और मन पर भी। रेलगाड़ी चलाने वाले ड्राइवरों को भी दशकों से इसी परिस्थिति में छोड़ देना सिर्फ अमानवीयता की इंतहा ही नहीं है, यह वस्तुतः आजाद भारत में भी ब्रिटिश शासकों जैसी मानसिकता का सुबूत है।
जो लोग भारत में रेल के विकास से परिचित हैं, वे तस्दीक करेंगे कि अंग्रेजों ने यहां इसकी शुरुआत जनता की सहूलियत के लिए नहीं, बल्कि कच्चा माल यहां से ब्रिटेन ले जाने के लिए की थी। इसलिए भारतीय रेल में मालगाड़ी का महत्व सवारी गाड़ियों से अधिक रहा है।
सवारी गाड़ियों की दशा तो यह थी कि इसमें 1909 तक शौचालयों की व्यवस्था नहीं थी। उसी वर्ष साहेबगंज खंड में अखिल चंद्र सेन नाम के एक यात्री की पहल पर ब्रिटिश सरकार ने शौचालय की व्यवस्था शुरू की। कहानी है कि साहेबगंज के अहमदपुर स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही शौच के लिए गए सेन जब लौटकर स्टेशन पर आए, तो ट्रेन छूट चुकी थी। अंग्रेजी में शिक्षित सेन महाशय ने ब्रिटिश अधिकारियों को हर्जाने की चिट्ठी लिखते हुए ट्रेन में शौचालयों की जरूरत बताई थी, उसी के बाद इस दिशा में काम शुरू हुआ।
पर भारतीय रेल के हजारों ड्राइवर तो रोज अखिल चंद्र सेन के दर्दनाक अनुभव से गुजरते हैं। आज लंबी दूरी की रेलगाड़ियां घंटों बिना रुके चलती रहती हैं। कल्पना की जा सकती है कि लघुशंका या शौच की जरूरत महसूस होने पर ड्राइवर क्या करते होंगे! गाड़ी रुकने पर वे उतरकर रेल लाइन के किनारे या ट्रेन के पीछे की बोगियों में जाते हैं। लेकिन लंबी दूरी की कम स्टॉपेज वाली गाड़ियों में क्या व्यवस्था है? ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जब सिर्फ लघुशंका के लिए ट्रेन धीमी करने या रोकने पर ड्राइवरों को वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश होना पड़ा है!
रेल दुर्घटनाओं पर बनी जांच रिपोर्टों में से क्या किसी एक में भी इसका जिक्र है कि इंजन में टॉयलेट न होने का ड्राइवरों की मानसिकता, क्षमता और सजगता पर कोई फर्क पड़ता है या नहीं? बसों के ड्राइवरों को जब चाहे बस रोकने की सुविधा है, विमान उड़ाने वाले पायलटों को टॉयलेट की सुविधा है, मेट्रो ट्रेनों में ड्राइवरों के काम की अवधि ही इतनी हम है कि यह कोई मुद्दा नहीं है। फिर भारतीय रेल के 69,000 ड्राइवरों के साथ ही यह अन्याय क्यों?
महामना एक्सप्रेस की चमक-दमक पर खुश होने वालों को पता होना चाहिए कि अभी तक राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस की इंजन तक में टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है। फिलहाल जिस रेल इंजन में टॉयलेट की व्यवस्था है, वह दरअसल साबरमती खंड का डीजल लोको (भीम) है,जो मालगाड़ी ले जाती है।
अगर आजाद भारत में हमारी सरकारें थोड़ी भी मानवीयता का परिचय देतीं, तो रेल ड्राइवरों को थक-हारकर मानवाधिकार आयोग में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। अब चूंकि केंद्र में साफ-सफाई को प्राथमिकता देने वाली एक सरकार है, ऐसे में, क्या उम्मीद करें कि यह तस्वीर अब बदलेगी?