डिजिटल इंडिया सप्ताह का उद्घाटन कर प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने सिर्फ अपना चुनावी वायदा ही नहीं निभाया है, बल्कि इसे
सरकार की दो बड़ी परियोजनाओं-मेक इन इंडिया, और स्किल इंडिया-से भी जोड़कर
देखना चाहिए। मोटे तौर पर सरकारी दफ्तरों को कागज-मुक्त और लोगों को ऑनलाइन
करने की इस महत्वाकांक्षी योजना में देश को तकनीकी रूप से शक्तिशाली बनाने
की संभावनाएं हैं।
मसलन, यह लोगों को इस अर्थ में डिजिटल बनाएगा कि वे
सरकारी वेबसाइट पर लॉकर खोलकर उसमें निजी दस्तावेज रख सकेंगे और किसी के
मांगने पर उसके साथ ऑनलाइन शेयर कर सकेंगे। यानी सरकारी दफ्तरों और बैंकों
की तरह व्यक्तिगत तौर पर भी कागज का प्रयोग धीरे-धीरे खत्म होगा। कहा जा
रहा है कि इससे सरकारी दफ्तरों की क्षमता बढ़ेगी, लोगों का काम आसान होगा
और पैसे व समय की बचत भी होगी।
व्यापक तौर पर इसमें गांवों और पंचायतों को
इंटरनेट व मोबाइल से जोड़ने, डाकघरों को मल्टी सर्विस सेंटर में तब्दील
करने, ई-गवर्नेंस के तहत शिक्षा, तकनीक, स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा और दूसरी
सेवाओं को इंटरनेट से जोड़ने, सूचनाओं और दस्तावेजों को ऑनलाइन करने, छोटे
शहरों के युवाओं को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ने, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन
के मोर्चे पर आत्मनिर्भर होने आदि का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें, जाहिर है,
समय लगेगा।
इस योजना का आर्थिक पक्ष यह है कि इससे जहां निवेश आएगा, वहीं
रोजगार भी मिलेगा। चुनौती अलबत्ता यह है कि ऐसी एक विराट योजना की सफलता उस
देश में फौरी तौर पर कठिन नजर आती है, जहां इसके लिए आधारभूत सुविधाएं
नहीं हैं। केरल के उस इडुक्की जिले का उदाहरण सामने है, जिसे पिछले साल देश
का पहला ब्रॉडबैंड जिला घोषित किया गया था।
पर आज भी वहां इंटरनेट की
स्पीड चार एमबीपीएस से अधिक नहीं है, जबकि वायदा सौ एमबीपीएस का था! जब
केरल में यह हाल है, तब उत्तर प्रदेश को डिजिटल नक्शे में लाना तो और भी
मुश्किल है, जहां अनेक इलाके अब भी अंधेरे में डूबे हुए हैं। डिजिटल इंडिया
की सफलता इंटरनेट के प्रति लोगों को जागरूक करने के अलावा बिजली की
उपलब्धता पर भी निर्भर करेगी। लिहाजा सरकार को इसका ध्यान रखना होगा कि यह
सिर्फ एक योजना बनकर रह जाने के बजाय वास्तविक अर्थ में देश को बदले।