अपने पांच दशक लंबे कर्मजीवन में गुलजार ने निरंतर जिस श्रेष्ठता का परिचय दिया है, सिनेमा का यह सर्वोच्च सम्मान, दादा साहब फाल्के, उनकी उसी प्रतिभा पर मोहर लगाता है। मुंबई की फिल्म दुनिया में प्रतिभाएं ही टिकती हैं, इसके बावजूद संपूरन सिंह कालरा यानी गुलजार जैसे लोग कम होंगे।
इसकी वजह यह है कि उन्होंने जिस भी विधा में हाथ आजमाया, उसे यादगार बना दिया, चाहे वह पटकथा लेखन हो, संवाद हो, फिल्म निर्देशन हो या गीत लेखन। आनंद का संवाद या आंधी, परिचय और मौसम जैसी फिल्मों का निर्देशन ही किसी फिल्मकार को शोहरत दिलाने के लिए पर्याप्त है।
लेकिन इन सबसे अलग एक गीतकार के रूप में गुलजार की पहचान कहीं अधिक है और यही उन्हें इस शीर्ष सम्मान का हकदार भी बनाता है। हिंदी सिनेमा में विशिष्ट पहचान बनाने वाले साहिर लुधियानवी और शैलेंद्र जैसे दिग्गज गीतकार हुए हैं, पर अलग-अलग समय को शब्द देते हुए और तीन पीढ़ियों के लिए गीत लिखते हुए गुलजार ने खुद को जिस तरह ढाला है, वह अपनी मिसाल आप है।
सचिन देव बर्मन और हेमंत कुमार जैसों के साथ फिल्म करियर शुरू करने वाले इस गीतकार ने आर डी बर्मन और शंकर-जयकिशन के साथ जैसा तालमेल बिठाया, अब विशाल भारद्वाज और रहमान की पीढ़ी के साथ भी वह उतने ही सक्रिय और ऊर्जस्वित दिखते हैं। यह सचमुच बहुत आश्चर्यजनक है कि शोर और अश्लीलता के इस विकट समय में भी उनके गीतों में वैसी ही मौलिकता और वैसी ही स्तरीयता है।
एक व्यक्ति के तौर पर वह नफासत पसंद है, और चीज उनके गीतों में भी दिखती है। जब गीतकारों की एक पुरानी पीढ़ी ने बदलते दौर पर अफसोस जताते हुए चुप्पी साध ली है, तब मेरा गोरा रंग लइले और सुरमई अंखियों में नन्हा-सा एक सपना दे जा रहे लिखने वाला यह प्रयोगधर्मी बीड़ी जलइले और दिल तो बच्चा है जी जैसा गीत लिखकर अपनी प्रतिभा का सुबूत देता है। बच्चों के लिए चड्डी पहनके फूल खिला है लिखकर यह गीतकार खुद बच्चा बन जाता है, तो गोली मार भेजे में या गली-गली में भय बैठा है जैसी पंक्तियां लिखकर वह इस खौफनाक समय को ही अभिव्यक्त कर रहा होता है। हिंदी सिनेमा में गुलजार की शालीन उपस्थिति एक उम्मीद की तरह है।