देश का जो हिस्सा अमूमन हमारी राष्ट्रीय चिंता से गायब रहता है, चुनावी अवसर पर वह अचानक राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे पर आ गया है। अब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को ही लीजिए। उन्होंने पूर्वोत्तर में न सिर्फ कई रैलियां कीं, बल्कि इटानगर में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश को हमसे कोई ताकत नहीं छीन सकती।
यह दरअसल एक भावुक टिप्पणी है, जिसका व्यावहारिकता से कोई लेना-देना नहीं है। हमारी िवदेश नीति में चीन के प्रति वह आक्रामकता कभी नहीं दिखती, जो पाकिस्तान और कई बार अमेरिका के प्रति दिख जाती है। क्या नरेंद्र मोदी इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि अगर भाजपा के नेतृत्व वाला राजग केंद्र की सत्ता में आता है, तो चीन के प्रति सरकार की नीति बदल जाएगी?
ठीक इसी समय राष्ट्रीय सलाहकार समिति के अध्यक्ष सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने की जरूरत महसूस हुई, जिसमें पूर्वोत्तर में खेलों की बदतर स्थिति पर चिंता जताई गई है। प्रधानमंत्री खुद पूर्वोत्तर से सांसद हैं, लिहाजा वहां खेलों की खराब हालत से वह अंजान नहीं हो सकते।
सवाल यह है कि दस साल सत्ता में रहने के बाद यूपीए अध्यक्ष को पूर्वोत्तर की चिंता इसी समय क्यों हो रही है। इस बीच राष्ट्रीय राजधानी में पूर्वोत्तर की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया है। अरुणाचल के एक युवा नीडो तानियन की दिल्ली में हत्या के बाद राजधानी के ही एक इलाके में पूर्वोत्तर के लोगों को बाहर करने का स्थानीय लोगों का फैसला, जिस पर हालांकि अमल नहीं होने दिया गया, बताता है कि देश के पूर्वोत्तर इलाके के प्रति हमारा रवैया अब भी नहीं बदला है।
सच यह है कि पूर्वोत्तर को बाहरी लोगों से उतना खतरा नहीं है, जितना देश के भीतर अपने ही लोगों से है। बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में वे यहां आते हैं, लेकिन उन्हें उपेक्षा की नजरों से देखा है। वे इसी देश के नागरिक हैं, लेकिन उनकी वेशभूषा, खान-पान और संस्कृति का मजाक उड़ाया जाता है। सबसे पहले पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति यह नजरिया बदलने की जरूरत है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कमेटी गठित करने से लेकर एनसीईआरटी के सिलेबस में पूर्वोत्तर को शामिल करने तक तमाम जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।