ब्रह्मांड के सबसे छोटे कण की खोज के बाद ही साफ हो गया था कि इस विराट उपलब्धि को भौतिकी का शीर्ष वैज्ञानिक सम्मान मिलेगा। लेकिन इसके लिए किन्हें चुना जाए, यह नोबल समिति के लिए बड़ी चुनौती थी, क्योंकि इसकी खोज से अनेक लोग और संस्थान जुड़े थे।
बोसोन कणों का सिद्धांत भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस ने खोजा था, लेकिन उनकी मृत्यु के दशकों बाद इसकी खोज संभव हुई। चूंकि शांति का नोबल ही कभी-कभी संस्थाओं को दिया जाता है, ऐसे में सर्न से जुड़े दो वैज्ञानिक समूहों को यह पुरस्कार देने का सवाल ही नहीं था; फिर वे कोई नई खोज तो कर नहीं रहे थे। ऐसे में पीटर हिग्स और फ्रांस्वा इंग्लर्ट को गॉड पार्टिकल की खोज के लिए पुरस्कृत करने का फैसला कर नोबल समिति ने बिल्कुल सही किया है।
1964 में भौतिकी के जिस विख्यात जर्नल में इन कणों के बारे में बताया गया, उसमें पहला लेख रॉबर्ट ब्राउट और फ्रांस्वा इंग्लर्ट का ही था, जिन्होंने लिखा था कि ब्रह्मांड में मौजूद छोटे कण भार कैसे ग्रहण करते हैं। उसी में दूसरा लेख ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स का था, जिन्होंने इन अति सूक्ष्म कणों के बारे में भविष्यवाणी की थी। अगर रॉबर्ट ब्राउट जीवित होते, तो आज वह भी इस पुरस्कार के भागीदार होते। इन सबका ऐतिहासिक योगदान यह है कि इन्होंने ब्रह्मांड में व्याप्त इन छोटे कणों को ही सृष्टि का आधार बताया। इन्होंने यह तो कहा ही कि महाविस्फोट के बाद पृथ्वी के ठंडा होने पर इन्हीं कणों के कारण पदार्थों में द्रव्यमान संभव हुआ, यह भी कि आकाशगंगा, चांद, तारे, पेड़-पौधे और जीव जंतुओं की उत्पत्ति भी इन्हीं गॉड पार्टिकल से हुई है।
हालांकि गॉड पार्टिकल की खोज आसान नहीं थी। स्टीफन हॉकिंग ने इसकी खोज असंभव बताई थी, तो अमेरिका ने इसे ढूंढने की कोशिश में हार मान ली थी। लेकिन यूरोप ने अपनी खोज जारी रखकर न सिर्फ करीब आधी सदी पहले की गई इन वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी को सच साबित कर दिखाया, केवल यही नहीं कि भौतिक विज्ञान के स्टैंडर्ड मॉडल के इस आधार को ढूंढने में उन्होंने सफलता पा ली, बल्कि जैसा कि पीटर हिग्स अब भरोसा जता रहे हैं कि इसके जरिये भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ेगी।