तकरीबन 18 वर्ष बाद त्रिपुरा की राज्य सरकार ने विवादास्पद सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) को हटाने का फैसला किया है। माणिक सरकार की अगुआई वाली माकपा सरकार ने यह कदम अलगाववादी और उग्रवादी घटनाओं में कमी आने के बाद उठाया है।
वास्तव में एक लोकतांत्रिक देश में ऐसे कड़े कानून की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जिसमें सशस्त्र बलों को इतने असीमित अधिकार मिल जाते हैं कि वे किसी भी व्यक्ति को संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर सकते हैं, यहां तक कि गोली भी मार सकते हैं, और फिर उनके खिलाफ किसी तरह की कानूनी कार्रवाई तक नहीं होती! पहली बार 1958 में इसे नगालैंड में भड़के विद्रोह के कारण लागू किया गया था।
मगर प्रकारांतर से अफ्सपा को लेकर विवाद रहा है, क्योंकि जिन राज्यों में यह लागू है, वहां इसकी आड़ में मानवाधिकार हनन के मामले भी सामने आए हैं। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद गठित जस्टिस जे एस वर्मा कमेटी ने तो बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून की सिफारिश करते हुए अफ्सपा पर भी पुनर्विचार करने तक की सिफारिश की थी। अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने कहा था कि विवादग्रस्त क्षेत्र में महिलाओं की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अफ्सपा की समीक्षा होनी चाहिए। दरअसल 15 वर्षों से मणिपुर में अनशन कर रहीं ईरोम शर्मिला का संघर्ष भी इसी बात को लेकर है, जिनकी आंखों के सामने निर्दोष लोगों को सशस्त्र बलों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया।
फिलहाल सबसे बड़ा विवाद जम्मू-कश्मीर को लेकर है, जहां सत्तारूढ़ पीडीपी अफ्सपा के एकदम खिलाफ है, वहीं उसकी सहयोगी भाजपा इसे जारी रखने के पक्ष में है। हालांकि सवाल इसके औचित्य का है और राजनीतिक आधार पर इस पर कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए।
यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि ऐसे किसी भी फैसले से सेना या पुलिस बल का मनोबल कमजोर नहीं होना चाहिए। वास्तव में त्रिपुरा ने हर छह महीने में इसकी समीक्षा कर परिस्थितियों को अनुकूल पाने के बाद ही इसे हटाने का फैसला किया है। बेशक, जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियां त्रिपुरा से भिन्न हैं, लेकिन इस कड़े कानून को लचीला बनाने पर तो विचार किया ही जा सकता है, जिससे इसका दुरुपयोग रुक सके।