दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिला जनादेश देश में नए तरह की राजनीति का संकेत कहा जा सकता है। यह तो खुद अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने भी नहीं सोचा था कि उन्हें विधानसभा की 70 में से 67 सीटें मिल जाएंगी।
यही बात नौ महीने पहले लोकसभा चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाली भाजपा के बारे में कही जा सकती है, जिसके पास विधानसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष का दर्जा हासिल करने लायक विधायक भी नहीं होंगे! यह सिर्फ भाजपा की रणनीतिक भूल का नतीजा नहीं है, जिसने ऐन आखिरी में किरण बेदी को केजरीवाल के मुकाबले यह सोचकर खड़ा किया था कि दोनों ही भ्रष्टाचार के आंदोलन से निकले हैं।
असल में देश की राजनीति अब बदल रही है और लोग समझदार होते जा रहे हैं। इस नतीजे का साफ मतलब है कि लोग अब राजनीतिक हथकंडों और नकारात्मक प्रचार को पसंद नहीं करते। भाजपा की ओर से जहां प्रधानमंत्री मोदी तक ने केजरीवाल पर निजी हमले करते हुए उन्हें जंगल में नक्सलियों के साथ जाने की सलाह तक दे डाली थी, तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने काफी संयम से बिजली, सड़क, पानी, महिला सुरक्षा और सारे शहर को वाई-फाई से जोड़ने जैसी बातें की।
आम आदमी पार्टी को जिस तरह से हर तबके और क्षेत्र का वोट मिला है, उससे यह भी पता चलता है कि लोगों ने वर्गीय खांचे में बंटी राजनीति को भी खारिज किया है। यह जीत जितनी केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के प्रति लोगों के विश्वास से जुड़ी हुई है, उतनी ही इस बात से कि लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के विकास के वायदे के बावजूद भाजपा और संघ परिवार की संकीर्ण नीतियों और उनके नेताओं के बड़बोलेपन को नापसंद किया है।
इस चुनाव में हताश पड़ी कांग्रेस के लिए वैसे भी कुछ नहीं था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी इस पार्टी में कुछ बदलेगा कहना मुश्किल है। जहां तक आम आदमी पार्टी की बात है, तो अपने गठन के महज सवा दो वर्ष के भीतर वह दिल्ली में दूसरी बार सरकार बनाने जा रही है, भारतीय राजनीति में ऐसा कोई दूसरा आख्यान याद नहीं आता। असल में अब बारी आम आदमी पार्टी की है कि वह चुनाव के दौरान दिल्ली के लोगों से किए गए वायदों पर खरा उतरकर दिखाए।