रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने अपनी गलती दुरुस्त करते हुए स्वीकार किया है कि पुंछ सेक्टर में भारतीय जवानों पर हुए हमले को पाकिस्तानी सेना ने ही अंजाम दिया था, जिससे इस विवाद को खत्म मान लिया जाना चाहिए।
वास्तव में नियंत्रण रेखा के नजदीक पाकिस्तान से होने वाली किसी भी तरह की गतिविधियों को पाक सेना के बगैर अंजाम नहीं दिया जा सकता, इसमें किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। कुछ अंतराल को छोड़ दिया जाए, तो पाकिस्तानी सेना और आईएसआई लगातार सीमा पार से आतंकी गतिविधियों को अंजाम देती रही हैं।
छह जनवरी, 2004 को जनरल मुशर्रफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ संयुक्त बयान में भले ही पाकिस्तानी जमीन से भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम नहीं देने का वायदा किया था, लेकिन सच यह है कि पाकिस्तान लगातार नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करता रहा है।
बीते कुछ वर्षों में पाकिस्तान के अंदरूनी हालात भी काफी बदले हैं और वहां दूसरी बार लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हुआ है, बावजूद इसके पड़ोसी मुल्क के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है।
नवाज शरीफ ने कमान संभालने के बाद भारत से रिश्ते बेहतर करने की बात जरूर कही थी, लेकिन दोनों देशों के संबंध तब तक सामान्य नहीं हो सकते, जब तक कि सीमा पार से आतंकी गतिविधियां थम नहीं जातीं। मगर इसके साथ यह भी गौर करने वाली बात है कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार के बावजूद सेना का अलग वजूद है और नीति-निर्धारण में उसकी अहम भूमिका होती है।
नवाज शरीफ के साथ तो मुश्किल यह भी है कि सेना के साथ उनके रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे हैं। जाहिर है, जब तक पाकिस्तानी सेना पर दबाव नहीं बनाया जाता, तब तक कोई भी बात आगे नहीं बढ़ सकती।
कुछ विशेषज्ञ तो पाकिस्तानी सेना के साथ ही वार्ता का चैनल खोलने का सुझाव दे रहे हैं, लेकिन ऐसी कोई भी पहल दोधारी तलवार साबित होगी। कुछ लोग सैनिक के बदले सैनिक जैसी उन्मादी बातें भी कर रहे हैं। भावनाओं का ज्वार अपनी जगह है, पर भारत के लिए सबसे अच्छी स्थिति यही हो सकती है कि वह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार पर दबाव डाले, ताकि सार्थक बातचीत का माहौल बन सके।