कसभा चुनाव से ऐन पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा बलों पर नक्सलियों का कायराना हमला उनकी बौखलाहट को ही दर्शाता है। सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के जवानों पर यह हमला जीरम घाटी और तोंगपाल के बीच उसी क्षेत्र में किया गया, जहां पिछले वर्ष मई में कांग्रेस नेताओं के काफिले को नक्सलियों ने निशाना बनाया था।
अमूमन नक्सली चुनावों से पहले इस तरह की वारदात को अंजाम देकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देते हैं। इसके बावजूद पिछले वर्ष नवंबर में विधानसभा चुनाव के समय बस्तर में कुछ छिटपुट हमलों को छोड़ दें, तो नक्सली ऐसी किसी बड़ी वारदात को अंजाम नहीं दे सके थे, क्योंकि तब वहां सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए थे। तब इस सफलता को सुरक्षा बलों के साथ ही चुनाव आयोग की मुस्तैदी से भी जोड़कर देखा गया था।
मगर ताजा हमला बताता है कि इन तीन-चार महीनों में सुरक्षा या खुफिया व्यवस्था में कहीं कोई ढील जरूर पड़ गई है। जबकि दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों ओडिशा और महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित निर्वाचन क्षेत्रों के पुलिस अधिकारियों की चुनावी तैयारियों को लेकर बैठक भी हुई थी। खबर तो यह भी है कि केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने नक्सल प्रभावित नौ राज्यों को ऐसे हमलों के प्रति आगाह किया था।
मगर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय यह देखने की जरूरत है कि आखिर इस समस्या से निपटा कैसे जाए। लोकसभा चुनाव को देखते हुए पहली जरूरत तो यही है कि संबंधित राज्यों और केंद्र सरकार की विभिन्न सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर किया जाए। इसके अलावा समर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की बेहतर नीति के जरिये भी उन्हें हिंसा छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। दुखद है कि नक्सलियों ने जिन जवानों को निशाना बनाया, वे राष्ट्रीय राजमार्ग में हो रहे सुधार कार्य में लगे श्रमिकों की हिफाजत के लिए गए थे।
सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों को निशाना बनाने वाले नक्सली दरअसल हिंसा के दम पर सुरक्षा बलों, चुनाव कार्य में जुटे कर्मचारियों और मतदाताओं में भय पैदा करना चाहते है। मगर उन्हें पता होना चाहिए कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसा की कोई जगह नहीं हो सकती, इसमें सिर्फ वोट की ताकत चलती है।