भारतीय उद्योग परिसंघ के मंच से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जो भाषण दिया, वह सार्वजनिक मंच से उनका सबसे महत्वपूर्ण संबोधन था। अब तक संसद, पार्टी मंच और चुनावी जनसभाओं में उन्होंने जो भाषण दिए, उनसे उनकी बहुत आश्वस्त करने वाली छवि नहीं दिखी थी।
इस लिहाज से यह भाषण लंबा भी था और इसमें उनका आत्मविश्वास झलकाने की कोशिश भी दिखी। कांग्रेस के वरिष्ठता क्रम में दूसरे नंबर का नेता अगर बार-बार आम आदमी की हताशा, सत्ता राजनीति की संवेदनहीनता और भारतीय युवाओं की संभावनाओं के बारे में कह रहा है, तो उसे रेखांकित करना चाहिए। लेकिन उनके भावुक भाषण में ठोस तथ्य कम थे।
यह व्यावहारिक सच्चाई हो सकती है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था को पांच हजार सांसद-विधायक चला रहे हैं, लेकिन इस आधार पर संसदीय लोकतंत्र को खारिज नहीं कर सकते। बल्कि उन्हीं से पूछना चाहिए कि पिछले नौ वर्षों से सत्ता में होने के बावजूद उनकी पार्टी को आम आदमी के हित में कदम उठाने से किसने रोका है?
वह आम आदमी के हाथ में ताकत देने की बात कर रहे हैं, जबकि उनकी सरकार सहूलियतें देकर चुनावी लाभ उठाने में ही ज्यादा भरोसा करती है। राहुल जिस जगह पर हैं, वहां से वह सत्ता राजनीति की बुराइयों को आसानी से खत्म कर सकते हैं। लेकिन वह तो कांग्रेस के उस चलन के खिलाफ आवाज उठाते हुए भी नहीं दिखे, जिसमें विधानसभा चुनावों के बाद बाहरी आदमी को मुख्यमंत्री बना दिया जाता है!
प्रधानमंत्री पद का मुद्दा बेशक महत्वपू्र्ण नहीं है, पर यह एक राजनीतिक सवाल है, इसलिए बार-बार उछाला जाता है। वह जिस मंच से भाषण दे रहे थे, वहां शीर्ष उद्योग घरानों की मौजूदगी थी, जो देश के आर्थिक भविष्य के बारे में उनके नजरिये की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन उनके संबोधन में अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने का रोडमैप नहीं दिखा।
अब उनके भाषण का पार्टी स्तर पर जैसा बचाव किया जा रहा है, वह नेहरू-गांधी परिवार को रहनुमा समझने की पार्टी की मानसिकता का ही उदाहरण है। विकास और अर्थव्यवस्था के नाम पर ‘लाइव’ भाषणों की जो राजनीतिक बाजीगरी बहस के केंद्र में लाई जा रही है, उससे शायद ही कोई दिशा मिल सकती है।