अप्रैल, 2007 से जेल में बंद गुजरात के निलंबित डीआईजी वंजारा के नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर लगाए गए संगीन आरोपों में उनकी हताशा भले झलक रही हो, लेकिन इससे पता चलता है कि वहां पुलिस किस तरह से राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही थी।
वंजारा ने इन खुलासों के लिए जो समय चुना है, उस पर जरूर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनके आरोपों को इसलिए खारिज करना मुश्किल है, क्योंकि वह सोहराबुद्दीन, इशरत जहां, तुलसीराम प्रजापति और सादिक जमाल जैसे फर्जी मुठभेड़ के जिन चार मामलों में आरोपी हैं, उनमें से दो में अमित शाह भी सह आरोपी हैं।
सवाल उठता है कि जो वंजारा एक समय मोदी के सबसे विश्वसनीय पुलिस अधिकारियों में से थे और उन्हें 'भगवान' की तरह समझते थे, उन्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि गुजरात सरकार उनसे पल्ला झाड़ना चाहती है?
ऐसा भी नहीं है कि वंजारा किसी तरह की स्वीकारोक्ति कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपने इस्तीफे में, जिसे राज्य सरकार ने खारिज कर दिया है, कहीं भी इन मुठभेड़ों में या गुजरात दंगों के दौरान हुई मौतों पर अफसोस नहीं जताया है।
उनकी नाराजगी तो सिर्फ इस बात पर है कि मोदी सरकार ने उन्हें और जेल में बंद उनके साथी पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोई पहल नहीं की। वह साफगोई से कहते हैं कि उन्होंने तो सिर्फ मोदी सरकार की नीतियों पर ही अमल किया था। ऐसे में भाजपा और गुजरात सरकार ने भले ही वंजारा के आरोपों को खारिज कर दिया है, लेकिन मोदी की इस बारे में चुप्पी हैरान करने वाली है।
असल में मोदी की राजनीतिक आकांक्षाओं की राह में उनकी अपनी छवि और उनका अतीत ही सबसे बड़ा रोड़ा है, जिससे वह उबर नहीं पा रहे हैं।
यह बात कदाचित भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी जानते हैं, शायद इसलिए उन्होंने कहा भी है कि दंगों को लेकर मोदी काफी दुखी थे! बेशक फर्जी मुठभेड़ों के मामले अभी अदालत में चल रहे हैं और मोदी पर सीधे तौर पर कोई आरोप भी नहीं हैं, पर वंजारा के आरोपों से उनकी मुश्किल बढ़ सकती है।
बहुत संभव है कि 2014 के चुनाव के पास आते ही मोदी पर ऐसे हमले और बढ़ें, क्योंकि उनके विरोधी पार्टी के बाहर ही नहीं, भीतर भी हैं।