प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी बहुचर्चित अमेरिका यात्रा में न केवल भारतवंशियों को, बल्कि अमेरिकी निवेशकों को भी यह संदेश दे रहे हैं कि यदि वह भारत आते हैं, तो उनका खुले मन से स्वागत किया जाएगा। भारत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत जड़ता का जो माहौल बना हुआ था, मोदी ने उसे निरंतर बदलने की कोशिश की है।
अमेरिका जाने से पूर्व उन्होंने विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के मकसद से 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम की भी शुरुआत की है। वहां न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर से लेकर सेंट्रल पार्क और अपने तमाम कार्यक्रमों में वह ब्रांड इंडिया को नए ढंग से पेश कर रहे हैं। वैसे भी वह खुद को कारोबारी कहने से गुरेज नहीं करते।
भारतवंशियों के बीच उन्हें लेकर दिखी उत्सुकता से समझा जा सकता है कि उन्हें भी मोदी से काफी अपेक्षाएं हैं। अमेरिका में इस वक्त तकरीबन 30 लाख भारतवंशी रह रहे हैं और यह संख्या आने वाले वर्षों में बढ़नी ही है। मगर मोदी की अमेरिका यात्रा सिर्फ भारतवंशियों के बीच उनकी मौजूदगी तक सीमित नहीं है। वास्तव में भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले कुछ महीनों से ठंडे चल रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन में खाद्य सब्सिडी के अलावा कॉपीराइट और पेटेंट कानून को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद हैं।
इसके अलावा दोनों देशों के बीच परमाणु समझौता जवाबदेही कानून को लेकर अटका हुआ है। इसके बावजूद मोदी की इस यात्रा को एक अच्छी शुरुआत के तौर पर देखना चाहिए, खासकर इसलिए, क्योंकि अमेरिका 2002 के दंगों में उनकी कथित भूमिका को लेकर उन्हें वीजा देने से इन्कार करता रहा है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में अपने पहले संबोधन में पाकिस्तान की भड़काऊ कार्रवाइयों के बावजूद उसकी ओर दोस्ताना रुख दिखाकर भारत के पक्ष को ही मजबूत किया है। मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ व्यापक संधि की वकालत कर अंतरराष्ट्रीय मुहिम में भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया है।
अंतरराष्ट्रीय राजनय में अपनी जगह बना रहे मोदी अमेरिका जाने से पहले भारत आए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिल चुके हैं और जापान में उनकी प्रधानमंत्री शिंजो अबे से मुलाकात भी चर्चित रही। और अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से मिलकर आतंकवाद और निवेश के मोर्चे पर क्या कुछ ठोस आश्वासन लेकर लौटते हैं।