लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने कांग्रेस के साथ बिहार विधानसभा की दस सीटों के उपचुनाव के लिए जो गठबंधन किया था, उसके नतीजे सामने हैं। इसे नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी के तौर पर भले न देखा जाए, पर इससे यह तो पता चलता ही है कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में जो माहौल बना था, उसका रंग कुछ फीका जरूर पड़ा है।
कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मिली सीटें भी इसकी पुष्टि करती हैं। इससे पहले उत्तराखंड विधानसभा की तीन सीटों के उपचुनावों में भी कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। तो क्या मोदी का जादू खत्म हो रहा है? ऐसा कहना उचित नहीं होगा। लेकिन ऐसे समय जब कुछ सर्वे यह बता रहे हैं कि यदि आज लोकसभा के चुनाव हो जाएं, तो भाजपा साढ़े तीन सौ सीटें तक हासिल कर सकती हैं, उपचुनाव के नतीजे बदलती राजनीति की ओर इशारा भी कर रहे हैं।
असल में लोकसभा चुनाव के बाद ही यह साफ होने लगा था कि किसी समय जिस तरह से कांग्रेस के बरक्स विकल्प बनने के लिए गैरकांग्रेसी दलों को हाथ मिलाना पड़ा था, उसी तरह अब भाजपा को चुनौती देने के लिए गैरभाजपाई दल एकजुट होने की कोशिश कर सकते हैं। यह भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए चिंता की बात होगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी देखने की जरूरत है कि गैरभाजपाई दलों की एकजुटता की गुंजाइश कहां और कितनी है। अभी सिर्फ 18 विधानसभा सीटों के उपचुनाव हुए हैं और अगले महीने गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा की करीब 30 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। इन राज्यों ने लोकसभा चुनावों में 134 सीटें देकर मोदी की जीत की पटकथा लिखी थी।
जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है, तो वहां बिहार जैसे प्रयोग की गुंजाइश फिलहाल नजर नहीं आ रही है। इसके अलावा महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा के चुनाव होने हैं, जहां लालू और नीतीश का कोई वजूद नहीं है। महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच की खींचतान अब तक खत्म नहीं हुई है, वहीं हरियाणा में कांग्रेस को अपने दम पर उतरना है। कुल मिलाकर स्थिति अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। वास्तव में गैरभाजपाई गठजोड़ की राजनीति कांग्रेस के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी और अगले कुछ महीने में होने वाले चुनावों के नतीजे इसकी तस्दीक करेंगे।