इससे इनकार नहीं कि आज की चुनावी लड़ाई में विज्ञापन एक बड़ी भूमिका निभाते हैं।
देश से बाहर भी टोनी ब्लेयर और बराक ओबामा के चुनावी विज्ञापन अभियानों का खासकर जिक्र होता है, जिन्होंने उनकी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन अपने यहां अपनी और अपनी पार्टी की छवि चमकाने के लिए जनता के पैसे का दुरुपयोग जिस तरह बढ़ रहा है, वह बेहद चिंतनीय है।
दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा विज्ञापनों के जरिये सरकारी धन के व्यापक दुरुपयोग का मामला इसकी ताजा बानगी है, जिस बारे में लोकायुक्त ने राष्ट्रपति से शिकायत की है।
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2004-05 में विज्ञापनों पर दिल्ली सरकार ने लगभग चार करोड़ रुपये खर्च किए थे, जो 2008-09 में करीब पांच गुना बढ़कर 22.56 करोड़ रुपये हो गए।
अपने पद का बेजा इस्तेमाल करते हुए मुख्यमंत्री ने सूचना और प्रसारण विभाग को सरकार की बेहतर छवि पेश करने के लिए योजना बनाने को भी कहा था!
अच्छी बात यह है कि लोकायुक्त ने राष्ट्रपति को भेजे अपने पत्र में दिल्ली सरकार द्वारा खर्च की गई विज्ञापन राशि का एक हिस्सा लौटाने का निर्देश देने के साथ ही भविष्य में सरकारी धन का दुरुपयोग न करने की चेतावनी दी है।
लेकिन इस मामले को लोकायुक्त के सामने लाने वाली भाजपा के शासन वाले राज्यों में भी जनता के पैसे से अपनी छवि चमकाने का काम खूब चल रहा है।
खुद राजग ने 2004 के इंडिया शाइनिंग कार्यक्रम के दौरान विज्ञापनों में करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपये फूंक दिए थे। इसी तरह तमाम मोर्चों पर पिट चुकने के बावजूद यूपीए सरकार आगामी चुनाव के लिए विज्ञापनों पर दिल खोलकर खर्च कर रही है।
सिर्फ यही नहीं कि व्यावहारिक जमीन पर व्याप्त गरीबी और भ्रष्टाचार के बीच विज्ञापनों का झूठ अनैतिक होने के साथ-साथ आपराधिक भी है, तिस पर चुनावी आचार संहिता के बीच विज्ञापनों को 'बेहतरी के लिए सत्तारूढ़ पार्टी को ही वोट देने' के भावुक भयादोहन में जिस तरह बदल दिया जाता है, वह ज्यादा देखने लायक है।
ऐसे में दिल्ली के लोकायुक्त की पहल को सजग नागरिक भरोसे की तरह भले देखें, पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दल इससे कोई सबक लेंगे, यह उम्मीद कम है।