पहले संगठन और उसके बाद केंद्रीय मंत्रिपरिषद में फेरबदल के जरिये कांग्रेस ने संदेश देने की कोशिश की है कि वह खुद को मिशन 2014 के लिए तैयार कर रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अगले आम चुनाव से पहले के संभवतः आखिरी फेरबदल में कोई बड़ा उलटफेर नहीं किया है और कुछ रिक्तियों को ही भरा है। मगर जिस तरह से कुछ मंत्रियों को हटाकर संगठन में लाया गया है, उससे पार्टी की रणनीति और दशा-दिशा की झलक मिलती है।
असल में पार्टी का जोर खासतौर से संगठन पर दिखाई देता है और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के भरोसेमंद लोगों को जिस तरह महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं, वह यह समझने के लिए काफी है कि पार्टी भाजपा के मिशन 2014 की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी के मुकाबले उन्हें औपचारिक रूप से अपना चेहरा घोषित करे या न करे, चुनावी रणनीति उनके निर्देश पर ही बनाई जा रही हैं।
मसलन उत्तर प्रदेश को ही देखा जा सकता है, जहां अगले आम चुनाव का महाभारत लिखा जाना है। वहां भाजपा के अमित शाह के मुकाबले कांग्रेस ने गुजरात से ही ताल्लुक रखने वाले और राहुल के अत्यंत विश्वसनीय उन्हीं मधुसूदन मिस्री को कमान सौंपी है, जिन्होंने कर्नाटक में पार्टी को सत्ता दिलाई। मंत्रिमंडल से हटाकर पार्टी महासचिव अजय माकन को संचार, प्रचार और प्रकाशन विभाग की कमान सौंपने का मतलब है कि पार्टी खासतौर से मीडिया के सामने युवा चेहरों को आगे करना चाहती है।
लेकिन विरोधाभास देखिए कि नई कांग्रेस कार्यसमिति की औसत उम्र जहां 52 वर्ष है, वहीं सोमवार को शामिल किए गए आठ मंत्रियों की औसत उम्र 70 से भी अधिक है! इस बदलाव में बेशक, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सबसे विश्वस्त अंबिका सोनी को उनके कार्यालय से संबद्ध किया गया है, लेकिन यह साफ कर दिया गया है कि पार्टी में राहुल गांधी का समय शुरू हो चुका है।
खुद मनमोहन सिंह ने मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन के बाद कहा है कि वह तो चाहते हैं कि राहुल उनकी जगह लें! बहरहाल, टीम राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूपीए के कार्यकाल में हुए घोटालों, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों के कारण कांग्रेस की बिगड़ती छवि को सुधारने की ही है।